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'पीएम मोदी के रहते सवर्ण जाति को...', UGC गाइडलाइन विवाद में कूदे निशिकांत दुबे

By Digital Desk Edited By: Mritunjay Pathak
Published: Sat, 24 Jan 2026 04:57 PM (IST)Updated: Sat, 24 Jan 2026 07:00 PM (IST)

UGC के नए इक्विटी रेगुलेशन 2026 पर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है, जिससे सवर्ण समाज में चिंता है। ...और पढ़ें

HighLights

  1. UGC New Guidelines 2026 का भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने किया बचाव।

  2. EWS की दिलाई याद, कैसे मोदी ने सर्वोच्च न्यायालय से मान्यता दिलाकर 10 प्रतिशत आरक्षण।

  3. मोदी सरकार संतुलन बिगाड़ने नहीं, व्यवस्था सुधारने आई है।

डिजिटल डेस्क, गोड्डा। UGC New Guidelines 2026: देश की सियासत में इस वक्त सड़क से ज्यादा गर्मी सोशल मीडिया पर है। वजह बना है UGC का नया रेगुलेशन-Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026-जिसने जाति, आरक्षण और समानता की बहस को फिर भड़का दिया है। दिलचस्प यह है कि इस बार सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले सवर्ण समाज के कुछ वर्ग भी बेचैनी जाहिर कर रहे हैं।

सवर्ण जाति के बच्चों को कोई नुकसान नहीं

इंटरनेट मीडिया पर चल रही चर्चाओं में दावा किया जा रहा है कि नए नियमों से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में संतुलन बदल सकता है। इसी उफनते माहौल के बीच गोड्डा के बीजेपी सांसद डॉ. निशिकांत दुबे मैदान में उतर आए हैं। उन्होंने सीधे संदेश दिया है-मोदी जी के रहते सवर्ण जाति के बच्चों को कोई नुकसान नहीं होगा। यह बयान अब इस पूरे विवाद का राजनीतिक केंद्र बन चुका है।

नए नियमों का दायरा ओबीसी तक बढ़ा

दरअसल, UGC द्वारा 15 जनवरी 2026 से लागू किए गए इन नए नियमों का घोषित मकसद उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव पर लगाम कसना है। पहले ऐसे प्रावधान मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) तक सीमित माने जाते थे, लेकिन अब दायरा बढ़ाकर अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी स्पष्ट रूप से शामिल कर लिया गया है। यानी अब अगर किसी OBC छात्र, प्रोफेसर या कर्मचारी को जाति के आधार पर भेदभाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो वह औपचारिक शिकायत दर्ज करा सकता है।

यह समिति यूजीसी को भेजेगी रिपोर्ट

नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समान अवसर प्रकोष्ठ (Equal Opportunity Cell) बनाना अनिवार्य कर दिया गया है। इतना ही नहीं, एक Equity Committee भी गठित होगी, जिसमें महिला, दिव्यांग, SC, ST और OBC वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा। यह समिति हर छह महीने में रिपोर्ट तैयार कर सीधे UGC को भेजेगी। साफ है-अब संस्थानों की जवाबदेही पहले से कहीं ज्यादा कड़ी होने वाली है।

यही वह बिंदु है, जहां से राजनीतिक तापमान बढ़ा है। सोशल मीडिया पर कुछ समूह इसे-संस्थागत संतुलन में बदलाव,  के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि समर्थक कह रहे हैं कि यह सिर्फ भेदभाव रोकने की प्रशासनिक व्यवस्था है, आरक्षण नीति में कोई नया बदलाव नहीं।

यह कानून किसी भी जाति या वर्ग के खिलाफ नहीं 

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने 24 जनवरी को X (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर इस बहस में सीधा हस्तक्षेप किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कानून किसी भी जाति या वर्ग के खिलाफ नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए 10% EWS आरक्षण लागू किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट की भी मंजूरी मिली। दुबे ने संविधान के अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए कहा कि समानता का अधिकार अटूट है और उसमें कोई छेड़छाड़ नहीं हो सकती।

उनका संदेश साफ था-सरकार संतुलन बिगाड़ने नहीं, व्यवस्था सुधारने आई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आश्वासन सोशल मीडिया की आग को ठंडा कर पाएगा? फिलहाल, UGC के नए नियमों ने शिक्षा नीति को सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है-जहां कानून से ज्यादा भावनाएं और धारणाएं टकरा रही हैं।