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हड़िया-दारू से नाता तोड़ मेरीवर्क ने शुरू किया मुर्गी का बिजनेस, अब हर महीने 10 से 15 हजार की कमाई

Published: Tue, 27 Oct 2026 07:18 PM (IST)

गोड्डा की मेरीवर्क किस्कू ने हड़िया-दारू बेचने का काम छोड़कर फूलो-झानो आशीर्वाद योजना के तहत मुर्गी पालन और खेती-बाड़ी अपनाई है।

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HighLights

  1. मेरीवर्क किस्कू ने हड़िया-दारू का काम छोड़ा।

  2. फूलो-झानो योजना से मुर्गी पालन, खेती-बाड़ी अपनाई।

  3. मासिक 10-15 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं।

विधु विनोद, गोड्डा। दिशोम गुरु शिबू सोरेन के सपनों को साकार करने की दिशा में महागामा प्रखंड के करनू गांव की आदिवासी महिला मेरीवर्क किस्कू मिसाल बनकर उभरी हैं।

कभी परिवार का भरण-पोषण करने के लिए हाट-बाजार में हड़िया-दारू बेचने को मजबूर मेरीवर्क ने अब इस काम को छोड़कर स्वरोजगार का रास्ता अपना लिया है।

आज वह मुर्गी पालन और खेती-बाड़ी के माध्यम से न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि अन्य महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं।

उनके इस प्रयास से हर माह 10 से 15 हजार रुपये की आमदनी हो रही है। दिशोम गुरु शिबू सोरेन आदिवासी समाज की महिलाओं को हड़िया-दारू बेचने के बजाय सम्मानजनक आजीविका से जुड़ने के लिए प्रेरित करते रहे थे।

उनकी इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकार की फूलो-झानो आशीर्वाद योजना के तहत महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने की पहल की गई। मेरीवर्क किस्कू ने इस योजना का लाभ उठाकर अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है।

आर्थिक तंगी से आत्मनिर्भरता तक का सफर:

मेरीवर्क किस्कू के पति नानीदार हेम्ब्रम मजदूरी करते हैं। परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण मेरीवर्क को भी आजीविका चलाने के लिए हड़िया-दारू बेचना पड़ता था। इसी दौरान उन्हें फूलो-झानो आशीर्वाद योजना का लाभ मिला।

इसके बाद उन्होंने खेती-बाड़ी के साथ मुर्गी पालन को अपनी आजीविका का माध्यम बनाया और धीरे-धीरे हड़िया-दारू बेचने का काम पूरी तरह छोड़ दिया।

इस बदलाव में झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के माध्यम से संचालित स्वयं सहायता समूह ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांव की 12 महिलाओं ने मिलकर चमेली आजीविका सखी मंडल का गठन किया।

दो बार 20-20 हजार रुपये का ऋण:

समूह के माध्यम से महिलाओं ने नियमित बैठकें, बचत और सामूहिक प्रयासों के जरिए अपनी आजीविका गतिविधियों को आगे बढ़ाया। समूह गठन के लगभग तीन महीने बाद मेरीवर्क और समूह की महिलाओं को 15 हजार रुपये की रिवाल्विंग फंड (आरएफ) राशि मिली।

इसके बाद सामुदायिक निवेश निधि (सीआइएफ) के तहत दो बार 20-20 हजार रुपये का ऋण प्राप्त हुआ।

इस आर्थिक सहयोग से आजीविका को व्यवस्थित करने, जरूरतों को पूरा करने और स्वरोजगार को मजबूत बनाने में मदद मिली। इससे मेरीवर्क का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम आगे बढ़ाए।

मुर्गी पालन से बढ़ी आमदनी, मिला नया अवसर:

मेरीवर्क किस्कू की मेहनत और मुर्गी पालन में उनकी रुचि को देखते हुए पशुपालन विभाग ने अंडा उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए उन्हें 300 सोनाली मुर्गियां उपलब्ध कराईं। इससे उनके व्यवसाय को विस्तार देने और नियमित आमदनी बढ़ाने का अवसर मिला है। आज वह अपने घर पर मुर्गी पालन कर सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।

मेरीवर्क की सफलता यह बताती है कि उचित मार्गदर्शन, सरकारी योजनाओं का सहयोग और स्वयं सहायता समूहों की सक्रियता से ग्रामीण महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन सकती हैं। खेती-बाड़ी और पशुपालन जैसी गतिविधियां महिलाओं के लिए आजीविका के स्थायी अवसर तैयार कर रही हैं।

गांव में शराबबंदी के लिए भी चला रहीं अभियान:

मेरीवर्क किस्कू अब केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने तक सीमित नहीं हैं। वह स्वयं सहायता समूह की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर गांव में शराबबंदी को लेकर जागरूकता अभियान भी चलाती हैं।

कभी मजबूरी में हड़िया-दारू बेचने वाली मेरीवर्क आज महिलाओं को सम्मानजनक आजीविका अपनाने और आत्मनिर्भर बनने का संदेश दे रही हैं।

जेएसएलपीएस की योजनाओं और स्वयं सहायता समूहों के सहयोग से ग्रामीण महिलाओं को बचत, ऋण और स्वरोजगार के अवसर मिल रहे हैं। इससे परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।

दिशोम गुरु शिबू सोरेन आदिवासी समाज के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहे। उनके सपने को साकार करने के लिए मैंने हड़िया-दारू बेचना छोड़कर फूलो-झानो आशीर्वाद योजना से जुड़कर स्वरोजगार का मार्ग चुना। इससे मेरे जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है। जेएसएलपीएस के माध्यम से संचालित स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने और उनकी आजीविका मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। - मेरीवर्क किस्कू