गोड्डा : शहर में ईद मिलादुन नबी के मौके पर गाजे बाजे के साथ मोहम्मदिया जुलूस निकाला गया। बड़ी संख्या में बच्चे और बुजुर्ग सहित युवाओं ने इस जुलूस में शामिल हुए। वहीं गोड्डा के मेला मैदान में इस्लाम धर्मावलंबियों ने जलसा कर हजरत मोहम्मद पैगंबर के संदेश को जन जन तक पहुंचाने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि ईद का अर्थ होता है उत्सव मनाना और मिलाद का अर्थ होता है जन्म होना। ईद-ए-मिलाद के रूप में जाना जाने वाला दिन मिलाद-उन-नबी पैगंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस दौरान शहर में सुरक्षा के कड़े प्रबंधक किए गए थे। जुलूस के साथ पुलिस के जवान साथ साथ चल रहे थे। जगह जगह स्टेटिक फोर्स के साथ दंडाधिकारी की भी प्रतिनियुक्ति की गई थी। इस दौरान खातिबो इमाम आजाद मिशवाही, मौलाना निजाम असरफी, मौलाना मन्नान, डा. कयूम अंसारी, जाहिद इकबाल, अफसर जवां, मो. सरफराज, इंतेखाब आलम, मकसूद आलम, माहताब आलम, फरहान उर्फ सिटू सहित बड़ी संख्या में अकलियतों ने भाग लिया।

मेला मैदान में आयोजित जलसे में वक्ताओं ने कहा कि इस्लाम में बेहद महत्वपूर्ण यह दिन इस्लामी कैलेंडर के तीसरे महीने रबी-उल-अव्वल के 12वें दिन मनाया जाता है। मोहम्मद साहब का जन्मदिन एक खुशहाल अवसर है लेकिन मिलाद-उन-नबी शोक का भी दिन है। क्योंकि रबी-उल-अव्वल के 12 वें दिन ही पैगंबर मोहम्मद साहब खुदा के पास वापस लौट गए थे। यह उत्सव मोहम्मद साहब के जीवन और उनकी शिक्षाओं की भी याद दिलाता है। क्या है इस दिन का महत्व :

ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार मोहम्मद साहब का जन्म सन 570 में सऊदी अरब में हुआ था। इस्लाम के ज्यादातर विद्वानों का मत है कि मोहम्मद का जन्म इस्लामी पंचांग के तीसरे महीने के 12वें दिन हुआ है। अपने जीवन काल के दौरान मोहम्मद साहब ने इस्लाम धर्म की स्थापना की, जो अल्लाह की इबादत के लिए समर्पित था। सन् 632 में पैगंबर मोहम्मद साहब की मृत्यु के बाद कई मुसलमानों ने विविध अनौपचारिक उत्सवों के साथ उनके जीवन और उनकी शिक्षाओं का जश्न मनाना शुरू कर दिया। मोहम्मद साहब के जन्म से जुड़े कुछ चमत्कार के बारे में अक्सर चर्चा होती है।

Posted By: Jagran

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