यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 17, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
टापू की जिंदगी जी रहे रोहनियांबेड़ा के ग्रामीण
टापू की जिंदगी जी रही रोहनियांबेड़ा की तीन सौ की आबादी

टापू की जिंदगी जी रहे रोहनियांबेड़ा के ग्रामीण
संवाद सहयोगी, बिरनी (गिरिडीह) : देश की आजादी को 75 वर्ष व झारखंड राज्य बने 21 वर्ष बीतने के बाद भी जिले के बिरनी प्रखंड अंतर्गत राजस्व गांव रोहनियांबेड़ा सुविधाओं के लिए तरस रहा है। यह गांव प्रखंड मुख्यालय से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर उतर पूरब दिशा में स्थित है। इस गांव में तीन सौ लोग निवास करते हैं। गांव में दलित पिछड़ी जाति वर्ग के लोग रहते हैं। यह गांव अब भी गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ है। जनप्रतिनिधियों व प्रशासनिक उपेक्षा के कारण सड़कविहीन रोहनियांबेड़ा गांव टापू बना हुआ है।
झारखंड में पहली बार वर्ष 2010 में पंचायत चुनाव हुआ था। इस पंचायत में शुरू से महिला मुखिया बनी। अब इस वर्ष उनके पति मुखिया बने हैं। अब तक किसी जनप्रतिनिधि ने इस गांव की सुध नहीं ली है। बरसात आते ही गांव टापू बन जाता है। बरसात में तीन माह तक गांव के लोगों का गांव से बाहर निकलना व प्रवेश करना बिल्कुल बंद हो जाता है। गांव के अधिकांश लोग मजदूरी व खेती कर जीविकोपार्जन करते हैं। गांव में एक उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय, सरकारी कूप, बिजली के अलावे कुछ भी सुविधा नहीं है। लोगों को जीने के लिए सबसे पहले सड़क की आवश्यकता होती है जो अब तक नहीं मिल पाया है। गांव के लोग खेतों की मेढ़ के सहारे चलकर गांव से निकलते व पहुंचते हैं। पूर्व उद्योग मंत्री सह कोडरमा के पूर्व सांसद रविंद्र कुमार राय का पैतृक गांव इसी प्रखंड का मरगोड़ा है। रोहनियांबेड़ा से मरगोड़ा करीब छह किलोमीटर दूर है। बगोदर विधानसभा क्षेत्र में लगातार भाकपा माले के विधायक स्व. महेंद्र सिंह के बाद उनके पुत्र विनोद सिंह को यहां की जनता ने जीताकर विधान सभा में प्रतिनिधित्व करने के लिए भेजा ताकि गांवों की समस्या का निदान वे करा सकें लेकिन समस्याएं जस की तस हैं। चुनाव में जैसे- तैसे उस गांव में नेता पहुंचते हैं और बड़ी बड़ी घोषणाएं कर चले आते हैं। जब जीत होती है तो उस गांव तक फिर जीते जनप्रतिनिधि पहुंचना भूल जाते हैं।
--केवल खेती व मजदूरी ही आय का जरिया : इस गांव के लोग खेती व मजदूरी कर जीविकोपार्जन करते आ रहे हैं। लोगों को घर आने के लिए पक्की सड़क तो दूर, कच्ची सड़क भी ठीक से नसीब नहीं है। बरसात आते ही यह गांव टापू की तरह बन जाता है और ग्रामीण करीब तीन माह तक कीचड़मय पगडंडी से आना-जाना करने को विवश हो जाते हैं। इस गांव में बिजली व उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय है। इस गांव में शादी, विवाह, यज्ञ या अन्य कार्यक्रम होता है तो उसमें भाग लेने के लिए बाहर से आनेवाले अतिथि दो किलोमीटर पगडंडी रास्ते से पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं।
---ग्रामीण क्या कहते हैं : रोहनियांबेड़ा के ग्रामीण नेमचंद राय, पियरी राय, जीतेंद्र वर्मा, मनोज राय, चून्नू राय, विजय राय आदि ने बताया कि यह एक राजस्व गांव है। यहां दलित व पिछड़ी जाति के ही लोग रहते हैं। गांव को सभी जनप्रतिनिधि अब तक उपेक्षित करते आ रहे हैं अन्यथा कब की सड़क बन गई होती। गांव मुख्य मार्ग से तीन तरफ यानि तीनों प्रखंड बिरनी, जमुआ व धनवार से जुड़ सकता है। केंदुआटांड़ मुख्य मार्ग से होते हुए खैरीडीह पंचायत सचिवालय तक जुड़ सकता है। इसके बीच में एक छोटी नदी भी है। रोहनियांबेड़ा से पंचायत सचिवालय की दूरी करीब आठ किलोमीटर है। कहा कि इस गांव में कोई रिश्ता करने के लिए नहीं पहुंचते हैं। जो लोग सुखी संपन्न हैं वे इस गांव से दूसरे गांव या गिरिडीह, सरिया, जमुआ व धनवार जैसे जगहों पर लाज लेकर शादी विवाह करते हैं। इस पंचायत की पहली मुखिया महिला थी पर अब पुरुष मुखिया हैं। मुखिया आठ किलोमीटर पैदल चलकर रोहनियांबेड़ा गांव पहुंचते हैं।
--एंबुलेंस भी नहीं पहुंच पाता : ग्रामीणों ने बताया कि गांव में यदि किसी की अचानक तबीयत खराब हो जाती है तो एंबुलेंस भी गांव में नहीं पहुंच पाता है। वह भी दो किलोमीटर की दूरी पर ही रुक जाता है। मरीज किसी तरह वहां तक पहुंचते हैं और तब एंबुलेंस पर चढ़ते हैं। बरसात में सबसे अधिक परेशानी उठानी पड़ती है। बरसात खत्म होने के बाद ग्रामीणों को कुछ राहत मिलती है।
