दिलीप सिन्हा, गिरिडीह : जैन धर्म के अनुयायियों को मोक्ष के लिए अपने कंधों पर बैठाकर पारसनाथ पर्वत की परिक्रमा कराने वाले करीब दस हजार से अधिक डोली मजदूरों को खुद के तारणहार की तलाश है। कारण, लॉकडाउन के कारण सभी धार्मिक स्थलों के दरवाजे बंद हैं। बाहर से आने वाले जैन तीर्थयात्रियों का आवागमन पूरी तरह से बंद है। ऐसे में यहां के करीब दस हजार से अधिक डोली मजदूर करीब चार महीने से पूरी तरह से बेरोजगार हो गए हैं। इन्हें यह चिता सता रही है कि कैसे उनके घरों के चूल्हे जलेंगे। इन मजदूरों की सुध न तो जैन संस्था के लोग ले रहे हैं और न ही सरकार। यही कारण है कि करीब आठ हजार डोली मजदूर यहां से पलायन कर गए हैं। जैन तीर्थयात्रियों की सेवा कर मिलने वाली पारिश्रमिक से घर चलानेवाले इन मोक्षदूतों के घर चूल्हा जलने की फिक्र है।

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अपने कंधों पर बैठाकर पहाड़ पर 27 किमी चलकर कराते वंदना

पारसनाथ पर्वत को जैन धर्म के लोग सम्मेद शिखर कहते हैं। यह जैन धर्म का सबसे बड़ा तीर्थस्थल है। 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकर ने इसी पारसनाथ पर्वत में निर्वाण प्राप्त किया है। दुनियाभर से जैन धर्म के लोग यहां पारसनाथ पर्वत की वंदना करने आते हैं। पारसनाथ पर्वत की वंदना काफी दूभर है। पहाड़ पर 27 किमी. चढ़ना पड़ता है। पहाड़ पर नौ किमी चढ़ने पर पा‌र्श्वनाथ मंदिर मिलेगा। पहाड़ की विभिन्न चोटियों पर भी जैन मंदिर है। इन चोटियों पर भी नौ किमी की यात्रा करनी पड़ती है। अनुमान है कि आधे से अधिक तीर्थयात्री ऐसे होते हैं जो पैदल पारसनाथ पहाड़ की 27 किमी. की यात्रा करने में सक्षम नहीं होते। ऐसे तीर्थयात्रियों को यहां डोली मजदूर धर्मशालाओं से ले जाकर डोली में बैठाकर इस दुर्गम यात्रा को पूरा कराते हैं। बदले में इन्हें तीर्थयात्री इनकी मेहनताना देते हैं। डोली मजदूरों में सबसे अधिक संख्या आदिवासियों की है।

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जहां सालों भर लगा रहता था मेला, वहां पसरा सन्नाटा

पारसनाथ पहाड़ पर जहां हजारों साल पुराना जैन मंदिर है, वहीं तलहटी जिसे मधुबन कहा जाता है वहां एक से बढ़कर भव्य एवं आकर्षक जैन मंदिर है। मधुबन में जैन धर्मशालाओं की भी कतार लगी हुई है। तीर्थयात्रियों के आगमन के कारण सालोंभर यहां गुलजार रहता है। लॉकडाउन के कारण यहां आज सन्नाटा पसरा हुआ है। इंसानों की बात तो छोड़िए जैन मंदिरों में डेरा डालने वाले बंदरों को भी भोजन एवं पानी के लाले पड़े हुए हैं। वहीं डोली मजदूर जगह-जगह विभिन्न यात्री शेडों में मायूस बैठे रहते हैं। इन्हीं मजदूरों में से कुछ से हमने बातचीत की। छोटू तुरी, राजू तुरी, कैलाश तुरी, किशोर तुरी एवं सुरेश तुरी ने बताया कि वे पूरी तरह से बेरोजगार हो गए हैं। कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

मजदूर संगठन समिति के प्रतिबंधित होने के बाद श्रम विभाग ने डोली मजदूरों का निबंधन कराया था। इसके बावजूद संकट की इस घड़ी में सरकार की ओर से कुछ भी नहीं मिल रहा है। जैन संस्थाएं भी हमारी कुछ मदद नहीं कर रही है।

Posted By: Jagran

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