जागरण संवाददाता,गिरिडीह : साल 2002 में सरकार की नक्सली सरेंडर पॉलिसी को स्वीकार कर जगरनाथ गंझू ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। कई मामले उसके वापस लिए गए। पुलिस की चूक की वजह से जगरनाथ को दोबारा जेल जाना पड़ेगा। सरकार ने आत्मसमर्पण करनेवाले नक्सलियों को सरकारी सहायता देने के साथ सभी केस वापस लेने की बात कही थी पर एक पुराने नक्सली घटना के मामले में पुलिस उसे तलाश रही है। भाकपा माओवादी संगठन का पूर्व हार्डकोर नक्सली जगरनाथ गंझू ने वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के आह्वान पर अपने 36 साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था। उस वक्त मुख्यमंत्री ने घोषणा की थी कि इन्हें तमाम तरह के सरकारी सुविधाएं दी जाएंगी। साथ ही इनके ऊपर लगे सभी मुकदमों को सरकारी वकील लड़ेंगे और इनका मुकदमा भी समाप्त कराया जाएगा। आज 18 वर्ष बीत जाने के बाद भी इन्हें ना ही किसी तरह की सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाया है और ना ही सरकारी घोषणा अमल में आ पाई है। दरअसल बगोदर थाना क्षेत्र में हुए एक नक्सली वारदात में इन पर वारंट हुआ व घर की कुर्की जब्ती हुई। अब वह सरेंडर करना चाहता है। इसी सिलसिले में वह गुरुवार को न्यायालय पहुंचा और अपने अधिवक्ता से कानूनी राय ली। जगरनाथ ने बताया कि सरकार की कथनी और करनी में काफी फर्क है। अधिवक्ता प्रकाश सहाय ने कहा कि यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। एक ऐसा व्यक्ति जो मुख्यधारा से जुड़कर मेहनत मजदूरी कर जीवन यापन कर रहा है, जिसने आतंक का रास्ता छोड़कर आम व्यक्ति की तरह जीना सीख लिया है, उसे 18 साल बाद एक लंबित मामले में जेल जाना पड़ेगा।

Posted By: Jagran

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