विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 19, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

आधार से वापसी: उसकी आंखों की पुतलियों में था घर का पता

By Sachin MishraEdited By:
Published: Wed, 19 Jul 2017 11:34 AM (IST)Updated: Wed, 19 Jul 2017 02:58 PM (IST)

आधार से तमाम योजनाओं को लिंक करने के सरकारी प्रयासों की सफलता में एक और कहानी जुड़ी है। जानिए...

आधार से वापसी: उसकी आंखों की पुतलियों में था घर का पता
आधार से वापसी: उसकी आंखों की पुतलियों में था घर का पता

जागरण संवाददाता, गढ़वा। यह एक युवक के घर लौटने की अनोखी कहानी है। वह खुद अपना पता बता पाने में अक्षम था तो पिता समेत पूरा परिवार यह सोच भी नहीं सकते थे कि उनका ओमप्रकाश जिसे उन्होंने कभी आंखों से ओझल होने नहीं दिया वह घर से भटकते हुए लगभग 2000 किमी दूर बंगलुरु में मिलेगा। तमाम प्रयासों की विफलता के बाद आधार कार्ड बनवाने के सरकारी कार्यक्रम ने उसके परिवार में खुशियां लौटा दीं।

इस खुशी का चश्मदीद पूरा जिला प्रशासन बना। उपायुक्त डॉ. नेहा अरोड़ा ने स्वयं परिवार के साथ कुछ वक्त बिताया और इस बीच की सारी बातों को सुना। आधार से तमाम योजनाओं को लिंक करने के सरकारी प्रयासों की सफलता में एक और कहानी जुड़ी है। आधार नंबर के कारण ही डेढ़ वर्ष पूर्व परिजनों से बिछड़ चुके ओमप्रकाश प्रजापति की घरवापसी हुई। दरअसल, ओमप्रकाश भटकते हुए बंगलुरुचला गया था। उसे वहां के एक अनाथालय में रखा गया था। स्थानीय सरकार ने अनाथालय में रहनेवाले सभी लोगों का आधार अनिवार्य कर दिया तो अनाथालय के कर्मी ओमप्रकाश को आधार कार्ड बनवाने के लिए ले गए।

कार्यालय में ओमप्रकाश (दाहिने से दूसरे) के परिजनों के साथ उपायुक्त डॉ. नेहा अरोड़ा।

आधार के लिए डाटा इंट्री करने के क्रम में जब आंखों की पुतलियों का रिकॉर्ड लिया गया और फिंगर प्रिंट लिए गए तो पता चला कि युवक का पहले से ही आधार बना हुआ है। वह अपना नाम और पता बता नहीं पा रहा था। लेकिन, इससे नाम, पता और मोबाइल नंबर तक मिल गया। इसके माध्यम से परिजनों को सूचना दी गई और ओमप्रकाश अपने परिजनों से मिल सका।

गढ़वा जिले के बरडीहा निवासी जगदीश प्रजापति ने बताया कि उनका 21 वर्षीय पुत्र ओमप्रकाश प्रजापति मानसिकरोगी है और अचानक एक दिन उत्तर प्रदेश के रेणुकूट में परिजनों से बिछड़ गया था। परिजनों ने उसकी बहुत खोजबीन की और अंत में हारकर घर लौट गए। लेकिन होनी को कुछ और मंजूर था। डेढ़ वर्ष बाद बंगलुरु से एक फोन आया कि उनका पुत्र ओमप्रकाश उनके पास है। सूचना के आधार पर ओमप्रकाश के पिता अपने बेटे को गढ़वा वापस लेकर आए।

यह भी पढ़ेंः पहले जारी करता था मौत का फरमान, अब कर रहा भगवान का आह्वान

यह भी पढ़ेंः राजनीति में बेटे-बेटियों को आगे बढ़ा रहे झारखंड के कांग्रेसी