रिटायर होने के बाद भी शिक्षक धर्म निभा रहे संजीव, आदिवासी बच्चों को कराते हैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी
Teachers Day Special: दुमका के सेवानिवृत्त शिक्षक संजीव कुमार प्रतिदिन 5 किमी यात्रा कर दिग्घी गांव के आदिवासी बच्चों को ...और पढ़ें
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बच्चों को पढ़ाते संजीव कुमार। फोटो जागरण
HighLights
सेवानिवृत्त शिक्षक संजीव कुमार आदिवासी बच्चों को मुफ्त शिक्षा दे रहे।
प्रतिदिन 5 किमी यात्रा कर प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कराते हैं।
उनके प्रयासों से कई छात्रों ने प्रतिष्ठित विद्यालयों में प्रवेश पाया।
राजीव, दुमका। कहते हैं कि शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होते हैं। समाज में निर्माण में इनकी भूमिका सतत व अविरल रहती है। दुमका के प्राथमिक विद्यालय दिग्घी से सेवानिवृत्त हुए शिक्षक संजीव कुमार इसकी एक मिसाल हैं।
वर्ष 2025 में शिक्षक की नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद भी तकरीबन 60 वर्ष की उम्र में संजीव कुमार रोज अपनी बाइक की सवारी कर दुमका से पांच किलोमीटर दूर दिग्घी जाकर वहां के आदिवासी बच्चों को नवोदय, नेतरहाट, केंद्रीय विद्यालय एवं सैनिक स्कूलों में दाखिले की तैयारी करवा रहे हैं।
संजीव के लिए जाड़ा, गर्मी, बरसात सब एक समान है। प्रतिदिन सुबह छह से आठ बजे तक इन बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराना इनकी दिनचर्या में शामिल है।
यह इनके भागीरथी प्रयासों का ही नतीजा है कि दिग्घी जैसे आदिवासी बाहुल्य गांव का विकास मिर्धा, मोनिका सोरेन, आकाश हांसदा, प्रिंशिला हांसदा अभी नवोदय विद्यालय हंसडीहा के छात्र हैं।
मोनिका सोरेन ने तो एकलव्य विद्यालय की भी परीक्षा में सफलता हासिल की थी। जबकि इसी गांव का संदीप कोल नेतरहाट की प्रतियोगी परीक्षा के पहले चरण को पार करने में सफलता हासिल की है।
अभी इनकी कक्षा में साइमन मरांडी, अमन मरांडी, विशाल हांसदा, बबलू हांसदा, शिवानी हांसदा, अंशु मुर्मू एवं मनीषा हांसदा जैसे मेधावी छात्र कतार में हैं जो विभिन्न विद्यालयों की प्रवेश परीक्षाओं में बाजी मारने की तैयारी में जुटें हैं।
संजीव बताते हैं कि उनके इस प्रयास में दिग्घी गांव के अभिभावकों की खास भूमिका है। उनकी मंशा है कि गांव के बच्चों की प्राथमिक शिक्षा का बुनियाद मजबूत हो ताकि उनका भविष्य उज्ज्वल हो सके।
गोड्डा के आदिम जनजाति पहाड़िया बाहुल्य सुंदरपहाड़ी से शुरु किए थे मुहिम
बात वर्ष 2010 की है। तब संजीव कुमार गोड्डा जिले के आदिम जनजाति पहाड़िया बाहुल्य सुंदरपहाड़ी प्रखंड के उत्क्रमित मध्य विद्यालय बरियारपुर में पदास्थापित थे। उस वक्त सुंदरपहाड़ी प्रखंड नक्सलियों की जद में था।
संजीव कहते हैं कि जब बरियारपुर में उनकी पदास्थापना हुई, तो उन्हें यह महसूस हुई कि हर मामले में पिछड़े इस क्षेत्र में विकास की रोशनी तब ही पहुंच सकती है जब यहां शिक्षा की अलख जगे।
उन्होंने अभिभावकों को जागरूक करने की पहल शुरु की और उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तैयार किया। जब गांव के पहाड़िया व आदिवासी बच्चे स्कूल आने लगे तो इन्होंने इनके लिए अलग से फ्री पाठशाला चलाने की शुरुआत की।
गांव के दो दर्जन से अधिक बच्चों को यह प्रतिदिन स्कूल के बाद अपनी पाठशाला में बुलाकर गढ़ने लगे। देखते ही देखते गांव की फिजां बदलने लगी और बच्चों के साथ अभिभावक भी शिक्षा का महत्व समझ गए।
वर्ष 2016 में उत्कृष्ट सेवा के लिए हुए सम्मानित
लगातार बच्चों के बीच उत्कृष्ट व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दान करने की वजह से संजीव कुमार को वर्ष 2016 में झारखंड राज्य स्थापना दिवस के मौके पर जिला प्रशासन की ओर से उपायुक्त और शिक्षा विभाग के जिला शिक्षा अधीक्षक ने विशिष्ट सेवा सम्मान से सम्मानित किया। जबकि इससे पूर्व वर्ष 2016 में गोड्डा में मतदान के दौरान उम्दा कार्य करने के लिए भी जिला प्रशासन की ओर से सम्मानित किया गया है।
परिवार में दो पुत्र इंजीनियर और पुत्री यूजीसी नेट की सफल अभ्यर्थी
संजीव कुमार के परिवार में पत्नी रश्मि कुमारी के अलावा दो पुत्र एवं एक पुत्री है। इनका एक पुत्र अंकुर कर्ण आइआइटी त्रिची से पढ़ाई कर अब मुंबई में कार्यरत है।
दूसरा पुत्र इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर विप्रो बंगलोर में है जबकि पुत्री प्रज्ञा वर्मा अभी रायपुर से कृषि स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर यूजीसी नेट की परीक्षा क्वालिफाई की है।
क्या कहते हैं संजीव कुमार
शिक्षा का मेरे दिल में खजाना है। शिक्षक हूं मेरा काम सिखाना है। शिक्षा एक ऐसा अभेद हथियार है जिसकी बदौलत बदलाव की हरेक ऊंचाई को हासिल करना संभव है। ग्रामीण इलाकों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की नितांत आवश्यकता है। एक शिक्षक होने के नेता उनकी भावना है कि वह सदैव बच्चों के बीच रहकर शिक्षा दान कर करते रहें। -संजीव कुमार, सेवानिवृत्त शिक्षक, प्राथमिक विद्यालय, दिग्घी, दुमका
