स्क्रीन की लत, सेहत पर आफत: दुमका में आधी रात तक रील का चक्कर उड़ा रहा नींद और एकाग्रता
मोबाइल का अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, जिससे थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
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एआई द्वारा जेनरेट इमेज।
HighLights
मोबाइल का अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है।
दुमका में कई किशोर मोबाइल की लत से उबर चुके हैं।
संतुलित स्क्रीन टाइम और अनुशासित दिनचर्या अपनाना बेहद ज़रूरी।
राजीव, दुमका। रात गहराती, घर सो जाता है, लेकिन मोबाइल की स्क्रीन पर जिंदगी जागती रहती है। एक रील से दूसरी रील, एक नोटिफिकेशन से दूसरे नोटिफिकेशन तक घंटों गुजर जाते हैं।
सुबह आंख खुलती है तो थकान, चिड़चिड़ापन और एकाग्रता की कमी साथ होती है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है, युवाओं की नींद टूट रही है और परिवारों के बीच संवाद सिमट रहा है।
कमोबेश यह स्थिति घर-घर की कहानी बनती जा रही है। मनोविज्ञान के विशेषज्ञ मोबाइल से बढ़ती इस नजदीकी को मन और अपनों से दूरी बढ़ाने का यंत्र मानते हैं।
फूलोझानो मेडिकल कॉलेज व अस्पताल के एसोसिएट व्याख्याता डॉ. पियूष रंजन के मुताबिक तकनीक जीवन को आसान बना रही है, लेकिन इसका बेकाबू इस्तेमाल मानसिक सुकून के लिए चुनौती भी बनता जा रहा है।
समाधान मोबाइल से दूरी नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल में ऐसा संतुलन है, जिसमें स्क्रीन भी रहे और सेहत भी। रिश्तों व सुकून के लिए भी जगह बचे।
दुमका के जिला मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में आने वाले मानसिक तौर पर बीमार मरीजों में सिजोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसआर्डर, एलिस्पी के अलावा अब मोबाइल के लती भी शामिल हो चुके हैं।
दुमका के खिजुरिया, सिघाड़ा पोखर समेत कई मोहल्लों से अब तक आधा दर्जन मोबइल एडिक्शन से परेशान किशोर यहां इलाज व काउंसलिंग के लिए पहुंच चुके हैं।
अच्छी बात यह कि इनमें से पांच किशोर डेढ़ से तीन माह में हुए पांच से छह सेशन की काउंसिलिंग के बाद अब पूरी तरह से सामान्य हो चुके हैं। इन पांचों किशोरों को स्क्रीन टाइम से छुटकारा तब मिल जब ये अपनी दिनचर्या को अनुशासित बनाने के लिए संकल्प लेकर आगे आएं हैं।
हर उम्र की अलग-अलग चुनौती
जिला मानसिक स्वास्थ्य केंद्र दुमका के मानसिक सोशल वर्कर जुल्फीकार अली भुट्टो कहते हैं कि बच्चों में स्क्रीन का बढ़ता समय खेलकूद, पढ़ाई और परिवार के साथ बातचीत को सीमित कर सकता है।

जुल्फिकार अली भुट्टो।
किशोर सोशल मीडिया पर लाइक और लोकप्रियता की होड़ में अपने आत्मसम्मान को दूसरों की प्रतिक्रिया से जोड़ने लगते हैं। युवाओं में काम, पढ़ाई और संदेशों का तुरंत जवाब देने का दबाव मानसिक थकान बढ़ा सकता है।
बुजुर्गों के लिए मोबाइल अपनों से जुड़े रहने का प्रभावी माध्यम है लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल प्रत्यक्ष सामाजिक मेलजोल और दिनचर्या को प्रभावित कर सकता है।
जुल्फीकार अली कहते हैं कि हालांकि हर मानसिक परेशानी का कारण मोबाइल नहीं है। पारिवारिक तनाव, आर्थिक दबाव, अकेलापन और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी इसकी वजह हो सकती हैं। इसलिए मोबाइल इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य के संबंध को समझना जरूरी है क्योंकि हर समस्या का निदान केवल स्क्रीन टाइम घटाने में नहीं तलाशना चाहिए।

डॉ. पियूष रंजन।
लगातार उदासी, बेचैनी, नींद में बदलाव, पढ़ाई या काम में गिरावट और सामाजिक दूरी जैसे लक्षण बने रहें तो मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्सक या स्वास्थ्यकर्मी से सलाह लेना जरूरी है।

सोना शर्मा।
बचाव के व्यावहारिक उपाय संकल्प के साथ अपनाने की जरूरत
- स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें।
- नींद से समझौता नहीं करें।
- खेल, व्यायाम और योग को दिनचर्या में शामिल करें।
- परिवार में संवाद बढ़ाएं।
- परेशानी बढ़े तो विशेषज्ञ से मिलें।
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मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग वरदान से कम नहीं है। योग अभ्यास और मेडिटेशन एवं खास कर योग निंद्रा के अभ्यास से डिप्रेशन से दुमका के कई लोग बाहर आएं हैं और स्वस्थ व आनंदित जीवन जी रहे हैं। मानसिक स्वास्थ्य के लिए सहज योग के आसन, आहार, प्राणायाम, मंत्र उच्चारण और योग निंद्रा अत्यंत लाभदायी है।
सोना शर्मा, योग प्रशिक्षिका, श्री सत्यम योग, दुमका
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी से बचना नहीं, बल्कि भावनात्मक संतुलन, स्वस्थ संबंध और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना भी है। मोबाइल पर कुछ समय कम और अपनों के साथ कुछ समय अधिक बिताना इसकी अच्छी शुरुआत हो सकती है। राज योग से जुड़ना भी इसका मजबूत विकल्प है।
डॉ. पियूष रंजन, एसोसिएट प्रोफेसर, फूलोझानो मेडिकल कॉलेज व अस्पताल, दुमका
मोबाइल शिक्षा, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और अपनों से संपर्क का उपयोगी साधन है। जरूरत इसके इस्तेमाल को जीवन पर हावी होने से रोकने की है। अभिभावकों का व्यवहार, परिवार का सहयोग, पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डिजिटल अनुशासन किसी एक दिन का संकल्प नहीं, रोजमर्रा की आदत होनी चाहिए।
