विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

कुंवारी कन्याओं के संग नई-नवेली दुल्हन ही करतीं हैं करमा, नौ प्रकार के अनाजों से जावा जगाने की अनोखी परंपरा

Published: Mon, 21 Sep 2026 04:05 PM (IST)

करमा पर्व भादो महीने की एकादशी को मनाया जाने वाला प्रकृति और भाई-बहन के प्रेम का त्योहार है, जिसमें कुंवारी ...और पढ़ें

HighLights

  1. करमा पर्व कुंवारी कन्याओं और नई-नवेली दुल्हनों द्वारा मनाया जाता है।

  2. जावा जगाना, प्रकृति पूजा और भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है।

  3. पारंपरिक नृत्य, गीत और विशेष पकवानों से उत्सव होता है जीवंत।

राजीव, दुमका। लोक आस्था का पर्व करमा हरेक वर्ष भादो महीने के शुक्ल पक्ष के एकादशी को मनाने की परंपरा है लेकिन इसकी शुरुआत पांच दिन पूर्व ही नहाय-खाय विधान से हो जाती है। कहीं-कहीं इस पर्व को सात दिनों तक भी मनाए जाने की परंपरा है। दुमका में मंगलवार को करमा पूजा पूरे विधि-विधान व पारंपरिक तरीके से करम गोसाईं की पूजा-अर्चना की जाएगी।

यहां करमा त्योहार भूइयां, घटवाल, घटवार, खेतौरी और पहाड़िया समुदाय के लोग मनाते हैं। करमा झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल के आदिवासी और गैर-आवासी समुदायों द्वारा मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण प्रकृति और भाई-बहन के प्रेम का त्योहार है।

खास बात यह कि इस त्योहार को कुंवारी कन्याएं व नई-नवेली महिलाएं ही मनाती हैं। शादी के बाद जिन स्त्रियों से संतान की उत्पत्ति हो जाती है वह करमा पूजन में शामिल नहीं होती हैं। करमा पूजन करने वाली कुंवारी लड़कियों को करमतीन कहा जाता है।

इस त्योहार में न सिर्फ प्रकृति और कृषि की पूजा होती है बल्कि यह भाई-बहन के प्रेम का भी प्रतीक है। करम वृक्ष की डाल की पूजा कर फसल और प्रकृति की समृद्धि की कामना करने की मान्यता इससे जुड़ी है।

एक लोक मान्यता यह भी रक्षाबंधन की तरह ही करमा में बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए 24 घंटे का निर्जला व्रत रखती हैं। यह करमा-धरमा की पौराणिक कहानी से जुड़ी मान्यता है जो कर्म और भाग्य का संदेश देती है। यह त्योहार सामूहिकता का भी प्रतीक है।

जावा जगाना का खास महत्व, अंकुरण और समृद्धि का है प्रतीक

करमा पर्व में जावा उगाने की प्रक्रिया को 'जावा जगाना' या 'जावा उठाना' कहा जाता है। यह पूरी तरह से प्रकृति की उर्वरता और आने वाली नई पीढ़ी की खुशहाली से जुड़ा है। जावा में सात या नौ प्रकार के अनाजों को विशेष रूप से शामिल किया जाता है जिसमें धान, घंघरा, गेहूं, मकई, कुर्थी, उड़द, मूंग, जौ और चना शामिल है।

इन अनाजों को टोकरी में बालू भरकर उसमें विधि-विधान से अंकुरित कराया जाता है।इसके अलावा खीरा व झिंगा का भी इस त्योहार में खास महत्व है। जावा जगाने का काम कुंवारी लड़कियां करती हैं। ये सुबह उठकर जावा को हल्दी पानी से सींचती हैं और इसके चारों ओर गोल घेरा बनाकर पारंपरिक नृत्य व करम गीत गाती हैं।

बिना धूप के केवल हल्दी पानी के प्रभाव से ये अंकुर सुंदर पीले सुनहरे रंग के रूप में उगते हैं। जावा का अच्छी तरह से उगना आने वाली अच्छी फसल और परिवार की समृद्धि का सूचक माना जाता है।

पूजा के अगले दिन इन जावा के पौधों को बहनें अपने भाइयों के कानों में आशीर्वाद के रूप में खोंसती हैं और आपस में बांटती हैं। बाद में इसे नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है जबकि अंकुरित अनाजों को प्रसाद के तौर पर बांटा जाता है।

झूमर नृत्य के बिना करमा का उत्सव अधूरा

करमा पूजा में जावा जगाने की विधि और पारंपरिक लोकगीत इस त्योहार की आत्मा है। इनके बिना करमा का उत्सव अधूरा माना जाता है।
करमा के गीत मुख्य रूप से झूमर शैली में गाए जाते हैं। इन गीतों में केवल मनोरंजन ही नहीं बल्कि इनमें भाई-बहन का वियोग, मिलन, प्रकृति की सुंदरता और जीवन के गहरे दर्शन छिपे होते हैं।

गीतों को मुख्य रूप से तीन चरणों में गाया जाता है। करम जगाने के दौरान जब करम वृक्ष की डाल को आदरपूर्वक आंगन या अखरा में लाया जाता है, तब लड़कियां 'चलु गे संगी चलु गे सहेली, करम राजा के आने गे...' (मतलब चलो सहेलियों, हम सब मिलकर आदर के साथ करम राजा को लेकर आएं।

भाई-बहन के प्रेम और मायके की याद में करमा के समय विवाहित बेटियां अपने मायके आने का बेसब्री से इंतजार करती हैं। अगर भाई उन्हें लेने नहीं पहुंचता, तो वे 'काहे ले भैया तोर अइले रे अइले, दीदी के लेवे ना अइले रे...' अर्थात भाई तुम क्यों नहीं आए, अपनी दीदी को मायके ले जाने क्यों नहीं पहुंचे?..।

जबकि तीसरी गीत करम विसर्जन के दौरान पूजा संपन्न होने के बाद जब करम की डाल को विसर्जित करने के क्रम 'आपन करम भैया के, धरम करम राजा आवते बछर घूरि अइह रे...' मतलब मेरा कर्म मेरे भाई को मिले और हे करम राजा! आप अगले साल फिर इसी समय लौटकर आना...। ये गीत मांदर, ढोल और झांझ की थाप पर सामूहिक रूप से गाए जाते हैं, जिससे पूरा माहौल ऊर्जा और भक्ति से भर जाता है।

क्या कहते हैं करमा मनाने वाले लोग

इस त्योहार में शुद्धता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। करमा पूजन-अनुष्ठान वैष्णवी विधि-विधान से मनाया जाता है। पूजन व प्रसाद में घांघरा समेत नौ तरह के अनाजों की अंकुरी के अलावा खीरा व झिंगा खास है।

भूइयां-घटवार-घटवाल युवा क्रांति मोर्चा के संयोजक नागेंद्र राय कहते हैं कि घटरा रोटी, खीर-पूड़ी और चावल चूर्ण का पुआ विशेष पकवान होते हैं। चावल के आटे से बना पीठा इस त्योहार का मुख्य आकर्षण होता है।

इसके अलावा उड़द दाल और चावल के घोल से धुस्का भी तैयार किया जाता है। कई क्षेत्रों में रागी यानि मड़ुआ के आटे से पारंपरिक रोटियां या चिल्ला बनाई जाती जो सेहत के लिए भी बहुत अच्छा होता है। पूजा के दिन लहसुन-प्याज के बिना शुद्ध शाकाहारी भोजन बनता है।

इसमें विशेष रूप से अंकुरित चना और बोड़ा की सूखी या रसदार सब्जी बनाई जाती है। दरअसल यह पर्व मोटे अनाजों के सम्मान से भी जुड़ा है जिसे हमारे पूर्वज पौष्टिक आहार मानते थे।

पूजा संपन्न होने के बाद करम राजा को चावल से बनी पारंपरिक हंडिया पेय का भोग भी अर्पित किया जाता है, जिसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। करमा त्योहार का सबसे ऊर्जावान और जीवंत हिस्सा इसका पारंपरिक सामूहिक नृत्य है।

मांदर और ढोल की थाप पर जब पूरा गांव एक साथ थिरकता है, तो वह दृश्य देखने लायक होता है। क्षेत्र और समुदाय के अनुसार करमा नृत्य को अलग-अलग लय और ताल में नाचा जाता है। इसकी मुख्य शैलियों में लहुसा, खेमटा, भिनसरिया, ठढ़िया है।

-जीतलाल राय, मुख्य संरक्षक, सामूहिक करम महोत्सव, रामगढ़

करमा नृत्य में कोई एक मुख्य कलाकार नहीं होता। पुरुष मांदर, ढोल, नगाड़ा और झांझ बजाते हैं, जबकि महिलाएं एक अटूट कतार या अर्ध-वृत्त बनाकर नाचती हैं। यह समाज की एकता और समानता को दर्शाता है। यह पर्व सामूहिकता का प्रतीक है।
-हिसाबी राय, संयोजक, सामूहिक करम महोत्सव, रामगढ़

पारंपरिक वेशभूषा का विशेष महत्व है। महिलाएं लाल बार्डर वाली सफेद सूती साड़ी पहनती हैं और बालों में जावा के फूल लगाती हैं। पुरुष पारंपरिक धोती-कुर्ता पहनते हैं और सिर पर पगड़ी बांधते हैं। पांच दिनों तक आयोजित होने वाला पर्व समाज को एकसूत्र में पिरोता है। इसमें गांव-गांव के ही नहीं दूसरे प्रदेशों से भी लोग हिस्सा लेने आते हैं।
-गोविंद राय, प्रखंड अध्यक्ष, भूइयां, घटवार, घटवाल क्रांति मोर्चा, रामगढ़

marandi

इंग्लिशलाल मरांडी।

संताल समुदाय में पांच तरह से कराम पूजा किया जाता

मोहरिया, रामगढ़ के ग्राम प्रधान इंग्लिशलाल मरांडी बताते हैं, संताल परगना में भूइयां,घटवार, घटवाल, खेतोरी, पहाड़िया के अलावा कोल व मोहली समुदाय के लोग ही करमा मनाते हैं। इस क्षेत्र के संताल समुदाय के लोग कराम पर्व मनाते हैं जो नवंबर में मनाया जाता है।

इसमें मां मोड़े की पूजा विधि-विधान से होती है। कराम डाल को विधि-विधान से दो किशोरियों के द्वारा लाकर स्थापित कर रात भर पूजा अर्चना की जाती है। सृष्टि व सृजन की कथा सुनने की परंपरा है। प्रकृति की पूजा होती है। इसमें जावा जगाना की परंपरा नहीं होती है।

संताल समुदाय में पांच तरह से कराम पूजा किया जाता है जिसमें मां मोड़े कराम पूजा सामूहिक स्तर पर होती है। जन्म कराम किसी के घर में जब कराम पौधा जन्म लेता है तो तब किया जाता है। गुरु कराम की पूजा गुरु कराते हैं।

मोड़ा कराम श्रद्धा कर्म के दौरान किया जाता है और चेला कराम किसी गुरु के चेला के द्वारा कराया जाता है। आदिवासी समुदाय में करम या कराम पूजा का विधि-विधान दूसरे समुदायों से अलग है लेकिन दोनों पूजा में प्रकृति व सृष्टि केंद्र में है।