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सावन की फुहार, राधा-कृष्ण का प्यार: दुमका सहित पूरे संताल परगना में झूलनोत्सव की मनमोहक छटा

Published: Wed, 26 Aug 2026 03:31 PM (IST)

सावन माह में 23 से 28 अगस्त तक झारखंड के दुमका सहित कई जिलों में झूलनोत्सव मनाया जा रहा है। ...और पढ़ें

दुमका सहित पूरे संताल परगना में झूलनोत्सव की मनमोहक छटा (AI Generated Image)

दुमका सहित पूरे संताल परगना में झूलनोत्सव की मनमोहक छटा (AI Generated Image)

राजीव, दुमका। सावन का महीना शिव-पार्वती ही नहीं, राधा-कृष्ण के आराधकों के लिए भी खास है। सावन माह में ही राधा-कृष्ण को झूले पर झूलाने का पर्व झूलनोत्सव मनाया जाता है। इस वर्ष झूलनोत्सव की शुरुआत 23 अगस्त से हुई है, जो 28 अगस्त को पूर्णिमा के दिन संपन्न होगी।

झूलनोत्सव को लेकर दुमका ही नहीं, संताल परगना के देवघर, जामताड़ा, पाकुड़, साहिबगंज व गोड्डा में भी उत्सवी माहौल है। दुमका के सोनुवाडंगाल निवासी सेवानिवृत्त शिक्षक दयामय माजि कहते हैं कि झूलन यात्रा हिंदू वैष्णव परंपरा का एक महत्वपूर्ण उत्सव है।

वर्षा ऋतु की हरियाली, फूलों से सजे झूले, राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं, भजन-कीर्तन और सामुदायिक सहभागिता इस पर्व की प्रमुख विशेषताएं हैं।

वैष्णव परंपरा में इस उत्सव के दौरान राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को फूलों और पत्तियों से सजे झूले पर विराजमान कर भक्त श्रद्धा पूर्वक झुलाते हैं। बंगाल और वैष्णव परंपरा में इसे विशेष रूप से झूलन यात्रा अथवा झूलन पूर्णिमा कहा जाता है।

दयामय बताते हैं कि पूर्वोत्तर झारखंड के संदर्भ में इसका महत्व विशेष है। दुमका, देवघर, जामताड़ा, गोड्डा, साहिबगंज और पाकुड़ में विभिन्न वैष्णव, शैव, शाक्त तथा स्थानीय लोकपरंपराओं के बीच ऐसे धार्मिक-सांस्कृतिक उत्सवों का विकास हुआ है।

राधा-कृष्ण की वृंदावन लीला के स्मरण का उत्सव है झूलन

झूलन यात्रा राधा-कृष्ण की वृंदावन-लीला के स्मरण का उत्सव है। श्रावण मास में मंदिरों और घरों में झूले सजाए जाते हैं। फूल, पत्तियां, बेल-पत्ते, रंगीन वस्त्र तथा सजावटी सामग्री से झूले को आकर्षक बनाया जाता है। राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को झूले पर स्थापित करके पूजा, आरती, भजन और कीर्तन किया जाता है।

यह आयोजन कई दिनों तक चलता है। बंगाल की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा में झूलन को श्रावण शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक मनाने की परंपरा मिलती है।

क्या कहते हैं झूलनोत्सव को जानने-समझने वाले?

इस पर्व का मूल धार्मिक आधार राधा-कृष्ण की वृंदावन-लीला है। वैष्णव साहित्य और भक्ति परंपरा में वर्षा ऋतु के वृंदावन, राधा-कृष्ण के प्रेम और सखियों के साथ उनके आनंद का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन मिलता है। झूलन उसी लीला का प्रतीकात्मक स्मरण है। भक्तों के लिए इसका अर्थ है ईश्वर के प्रति प्रेम, भक्ति, आनंद और प्रकृति के साथ आध्यात्मिक संबंध से है। - सुरेश कुमार रक्षित, कुंडहित, जामताड़ा

जामताड़ा के तुलाराम माल का कहना है कि राधा और कृष्ण को एक ही झूले पर स्थापित करना वैष्णव भक्ति में प्रेम, एकत्व और आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक माना जाता है। गौड़ीय वैष्णव परंपरा में राधा-कृष्ण का प्रेम भक्ति के सर्वोच्च भावों में माना गया है। वैष्णव पदावली साहित्य में भी राधा-कृष्ण की प्रेम-कथा केंद्रीय विषय रही है। इस दृष्टि से झूलन यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति-साहित्य, संगीत और लोककला का जीवंत रूप भी है।

वहीं, दुमका के परेशचंद्र गोराई ने कहा कि झूलन यात्रा वर्षा ऋतु में होती है। इस समय प्रकृति हरियाली से भर जाती है। मेघ, वर्षा, हरियाली, कदंब के फूल, लताएं और वृक्ष ये सभी तत्व कृष्ण की वृंदावन-लीला से जुड़े वैष्णव काव्य में बार-बार दिखाई देते हैं। इसीलिए झूलन की सजावट में प्राकृतिक सामग्री का प्रयोग केवल सौंदर्य के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति और भक्ति के सांस्कृतिक संबंध को व्यक्त करने के लिए भी किया जाता है।

रानीश्वर के तीर्थ कुमार पैतंड़ी ने कहा कि बैद्यनाथपुर के आसपास, सेहराकोड़ी इलाके में छोटे-छोटे बच्चों को राधाकृष्ण और अष्ट सखी तथा विभिन्न पौराणिक चरित्र सजाए जाते थे। राधाकृष्ण को झूला में अष्ट सखी झूलाती थीं। बगल में पौराणिक चरित्र खड़े रहते थे। बड़ा ही मजेदार दृश्यों को स्थापित किया जाता था।

उन्होंने कहा कि लोग प्रवीण लोग भरपूर उत्साह प्रदान करते थे। गांव-गांव में झूलन मेला लगता था। राज कहानी सिनेमा की शूटिंग के दौरान राजा झूलन यात्रा में शामिल होकर घने जंगल में राजकुमारी से शादी कर गाना गाते, आज झुलनेर कि आनन्द.., कि आनन्द.....। अब यह सब यादों में ही बसा है।