विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

बिहार-झारखंड में औषधीय पौधों की खेती से आदिवासी किसानों की बदलेगी तकदीर, जंगलों से खेतों में लाने के सीख रहे गुर

Published: Mon, 26 Oct 2026 05:21 PM (IST)

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की पहल पर पूसा समस्तीपुर बिहार-झारखंड के आदिवासी बहुल गांवों में औषधीय पौधों की खेती को ...और पढ़ें

संताल परगना में देवघर-दुमका और बिहार के जमुई जिले में आदिवासी किसानों को जोड़ने की तेज हुई पहल।

संताल परगना में देवघर-दुमका और बिहार के जमुई जिले में आदिवासी किसानों को जोड़ने की तेज हुई पहल।

HighLights

  1. पूसा समस्तीपुर ने औषधीय पौधों की खेती का प्रोजेक्ट शुरू किया।

  2. आदिवासी किसानों को अश्वगंधा, शतावर की खेती का प्रशिक्षण।

  3. किसानों की आय बढ़ाने, बिचौलियों को खत्म करने का लक्ष्य।

राजीव, दुमका। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली ने बिहार और झारखंड में औषधीय पौधों को जंगल और पहाड़ से निकाल कर किसानों के खेतों में लाने की पहल शुरू की है। इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को धरातल पर उतारने का जिम्मा बिहार के डाॅ.राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा समस्तीपुर के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. दिनेश राय को सौंपी गई है।

इस अभियान में डाॅ. शंकर झा और डाॅ. शिवशंकर प्रसाद भी अहम किरदार हैं। तय ब्लू प्रिंट के मुताबिक इस प्रोजेक्ट की शुरुआत बिहार के जमुई और झारखंड के दुमका और देवघर जिले के वैसे गांवों से की जा रही है जहां 90 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय की है।

पूसा के एसोसिएट प्रोफेसर और परियोजना प्रमुख डाॅ. दिनेश राय कहते हैं कि झारखंड में सिर्फ खनिज संपदा ही नहीं बल्कि औषधीय पौधों की भी प्रचुरता है। खास कर जंगल व पहाड़ों पर पाए जाने वाले औषधीय पौधों का सही और सार्थक उपयोग तभी संभव है जब इसकी पहचान व अहमियत गांव के किसान जान पाएंगे।

डाॅ. दिनेश के मुताबिक इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह भी औषधीय पौधों की खेती से आदिवासी किसानों को जोड़ कर न सिर्फ इनकी आमदनी में बढ़ोत्तरी कराई जाए बल्कि पारंपरिक खेती की सोच के दायरे से भी इन्हें बाहर निकाला जाए।

दुमका सदर प्रखंड के रामपुर पंचायत के 50 महिला किसान चिह्नित

दुमका में इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के लिए सदर प्रखंड के रामपुर पंचायत को चुना गया है। पंचायत के करमाटांड गांव की 50 महिलाओं के अलावा आधा दर्जन परिवारों को इससे जोड़ कर तकरीबन पांच एकड़ में भू-भाग में औषधीय पौधों की रोपाई शुरू की गई है।

इस प्रोजेक्ट से जुड़ कर काम कर रही करमाटांड गांव के प्रधान की बेटी की स्टेनशीला सोरेन कहती है कि उसके खेत में सिर्फ धान की खेती होती थी। धान कटने के बाद खेत खाली रहता था। परिवार को आमदनी के लिए दूसरे काम तलाशने पड़ते थे।

अभी वह औषधीय पौधों की खेती शुरु कर रही है। पूसा से आए विज्ञानियों ने इसके लिए ट्रेनिंग दी है। वह पहली बार एक एकड़ खेत में अश्वगंधा और शतावर के बीज लगा रही है। स्टेनशीला बताती है कि अश्वगंधा चार से पांच महीने की फसल है।

एक हेक्टेयर में इसकी लागत करीब 75 हजार रुपये आती है और दो से ढाई लाख रुपये तक का मुनाफा हो सकता है। शतावर 12 से 18 महीने का फसल है। 75 हजार रुपये की लागत है और मुनाफा डेढ़ से दो लाख रुपये तक हो सकता है।

झारखंड के जंगलों में दुर्लभ औषधीय पौधों का भंडार

झारखंड के जंगल सदियों से दुर्लभ औषधीय पौधों का भंडार है और अब तक इसका लगातार दोहन होता रहा है। इसकी वजह से कई जड़ी-बूटियां खत्म होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

डाॅ. दिनेश कहते हैं कि इस परियोजना का मकसद यह भी कि इन्हें खेतों में उगाकर संरक्षित व संवर्धित किया जाए। इसके लिए बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी रांची समेत कुछ अन्य संस्थान भी इसके प्रचार-प्रसार में लगे हैं।

सिर्फ योग गुरु बाबा रामदेव ही नहीं कई की निगाहें झारखंड पर

बाजार में औषधीय पौधों की तेजी से बढ़ती मांग की वजह से योग गुरु बाबा रामदेव व उनकी पंतजलि ही नहीं बल्कि हमदर्द, डाबर, बैद्यनाथ आर्युवेद, हिमालय वेलनेस कंपनी समेत कई की निगाहें पर झारखंड की उर्वर भूमि पर है।

डाॅ. दिनेश बताते हैं कि अगर प्रोजेक्ट सही दिशा में चला तो अगले तीन से चार वर्षों में इन इलाकों में औषधीय खेती किसानों को नई पहचान और उम्मीद देगी। कहा कि तय ब्लू प्रिंट के मुताबिक किसानों और खरीदारों के बीच सीधा संपर्क कराने की योजना है ताकि बिचौलियों की भूमिका खत्म हो जाए। डाॅ. दिनेश राय बताते हैं कि उत्पाद की खपत व बाजार के लिए देवघर का सत्संग आश्रम भी संपर्क में है।

क्या कहते हैं डाॅ. दिनेश राय

वित्तीय वर्ष 2025-26 में प्रारंभ हुए इस प्रोजेक्ट से दुमका के करमाटांड और मयूरानाचा के 94 किसानों को प्रशिक्षित किया जा चुका है जबकि देवघर के चेचाली, जितपुर, अर्जुनपुर, तिलैया और कुशबरिया के 96 किसानों को प्रशिक्षण दिया गया है।

चिह्नित गांवों में अश्वगंधा, शतावरी और तुलसी की नर्सरी तैयार की जा रही है। प्रशिक्षित किसानों को जैविक वर्मी कम्पोस्ट, लेमनग्रास और मेंथा के पौधे दिए गए हैं। अर्जुन, जामुन, बेल और नीम के पौधे भी बांटे गए हैं। खेती के लिए कुदाल, खुरपी और तिरपाल समेत कई औजार भी दिए गए। किसानों को पूसा ले जाकर किसान मेला का भ्रमण भी कराया गया है।

नवंबर-दिसंबर में विज्ञानियों की टीम इन गांवों में फिर आएगी। इस दौरान नर्सरी प्रबंधन, जैविक खाद के इस्तेमाल, सिंचाई और कीट प्रबंधन पर काम होगा। सूख चुके पौधों की जगह नए पौधे लगाए जाएंगे। आगे चलकर एलोवेरा, कालमेघ, आंवला, करंज और अशोक जैसे पौधे भी जोड़े जाएंगे। किसानों को प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन की ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

यह भी पढ़ें- झारखंड में पोल्ट्री ने हजारों महिलाओं को बना दिया सशक्त, 9 सहकारी समितियों से 122 करोड़ की कमाई

यह भी पढ़ें- झारखंड में धान अधिप्राप्ति: 29 लाख में से सिर्फ 1.65 लाख किसानों ने कराया पंजीकरण, मिलना है खाते में भुगतान

यह भी पढ़ें- झारखंड में बकरी, सूकर व बतख पालन से किसानों की आय बढ़ रही, मुख्यमंत्री पशुधन योजना में 90 प्रतिशत तक अनुदान