झूलनोत्सव में झूमता संताल परगना, राधा-कृष्ण की भक्ति में डूबता दुमका
Dumka News: झूलनोत्सव सावन माह में मनाया जाने वाला एक पौराणिक पर्व है, जो श्रीकृष्ण की दोल-लीला पर आधारित है।

झूलनोत्सव के दौरान मंदिरों में राधा-कृष्ण की होती पूजा। (फाइल फोटो)
राजीव, दुमका। सावन-भादो की हरियाली और बारिश के बीच झारखंड के संताल परगना, खासकर दुमका और बासुकीनाथ में झूलनोत्सव आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस उत्सव का संबंध राधा-कृष्ण के झूला-विहार से जुड़ा है।
मंदिरों और पूजा स्थलों को फूलों व रंग-बिरंगी सजावट से सजाया जाता है। भगवान की प्रतिमाओं को आकर्षक झूले पर विराजमान कर श्रद्धालु झुलाते हैं। इस दौरान भजन-कीर्तन और झूलन गीतों से माहौल भक्तिमय हो उठता है।
सावन माह के शुक्ल तृतीया तिथि से लेकर पूर्णिमा तक लगातार पांच दिन झूलन उत्सव मनाने की परंपरा पौराणिक है। जानकारों के मुताबिक झूलन श्रीकृष्ण की दोल-लीला को केंद्र में रख कर मनाया जाने वाला लोकानंद का पर्व ही नहीं बल्कि वैष्णव तत्व ज्ञान और दर्शन की एक गूढ़ अभिव्यक्ति भी है।
शास्त्रीय विधान के मुताबिक झूलन श्रीकृष्ण की हिंदोला-लीला अथवा झूलन-लीला का भक्ति भावपूर्ण रूप है। शास्त्रीय अवधारणा के अनुसार परमात्मा श्रीकृष्ण और उनकी आह्लादिनी शक्ति श्रीराधा वर्षा ऋतु में प्रकृति के सौंदर्य के बीच भक्तों के प्रेम रूपी बंधन से बंध कर हिंदोले अर्थात झूले पर विराजमान होते हैं।
यह झूलन-लीला जीवात्मा और परमात्मा के एकाकार का प्रतीक है। वैष्णव वेदांत अथवा अचिन्त्य भेदाभेद सिद्धांत के अनुसार श्रीकृष्ण परम ब्रह्म अथवा परमात्मा हैं और राधारानी उनकी स्वरूप शक्ति की सर्वोच्च अभिव्यक्ति आह्लादिनी शक्ति हैं। प्रेम स्वरूपिणी राधिका और आनंदमय कृष्ण मूलतः अभिन्न हैं किंतु लीला-रस का आस्वादन करने के लिए इन्होंने द्विरूप धारण किया है।
झूला प्रकृति की गतिशीलता का प्रतीक
झूलन अथवा झूला प्रकृति की गतिशीलता का प्रतीक है। झूले का लयात्मक आवर्तन प्रेम की तरंगों का प्रतीक माना जाता है। भक्त के हृदय की गहरी अनुरागमयी भावना रूपी प्रेम-डोर के आकर्षण से राधा-कृष्ण झूले पर विराजमान होते हैं। जब परमात्मा अपनी आह्लादिनी शक्ति के साथ एक आसन पर बैठकर हिंदोले में झूलते हैं तब सृष्टि का संपूर्ण जड़ एवं चेतन जगत उनकी कृपा से धन्य हो जाता है।
जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का गहन संकेत निहित
झूलन-लीला केवल राधा-कृष्ण की लीला ही नहीं बल्कि इसमें भक्त अर्थात जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का भी एक गहन संकेत निहित है। वैष्णवों के अनुसार झूला भक्त का हृदय है। जब संसार के विकारों और मलिनता से हृदय को मुक्त करके प्रेम रूपी डोर से परमात्मा के साथ जोड़ा जाता है तभी उसमें श्रीकृष्ण का आविर्भाव होता है।
जीवात्मा अनादिकाल से माया से बंधा हुआ परमात्मा से स्वयं को अलग अनुभव करता है। किंतु जब जीव भक्ति रूपी रज्जु के माध्यम से स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तब जीवात्मा और परमात्मा के बीच की समस्त दूरी समाप्त हो जाती है।
राधिका के माध्यम से कृष्ण-कृपा प्राप्त करना गौड़ीय वैष्णव धर्म का एक केंद्रीय भाव है। झूलन में राधा-कृष्ण का एक ही आसन पर विराजमान होना इसी परम एकाकार की ओर संकेत करता है।
प्राचीन शास्त्रीय एवं वैष्णव ग्रंथों में झूलन का उल्लेख
झूलन यात्रा का उल्लेख तथा इसके महात्म्य का वर्णन विभिन्न प्राचीन शास्त्रीय एवं वैष्णव ग्रंथों में मिलता है। जिसमें पद्मपुराण और भविष्य पुराण का उल्लेख सबसे ऊपर है।
इसी प्रकार सनातन गोस्वामी और गोपाल भट्ट गोस्वामी द्वारा रचित वैष्णव स्मार्त ग्रंथ हरि भक्ति विलास में भी श्रावण मास की शुक्ल तृतीया को श्रीकृष्ण के दोला रोहण तथा झूलन उत्सव के आयोजन संबंधी शास्त्रीय विधि का उल्लेख है।
रूप गोस्वामी के भक्ति रसा मृत सिन्धु और उज्ज्वल नीलमणि में झूलन-लीला के अप्राकृत रस तथा राधा-कृष्ण की श्रावण-लीला की काव्यात्मक और दार्शनिक व्याख्या मिलती है।
पद्मपुराण के मुताबिक श्रावणी पूर्णिमा पर श्री राधा गोविंद को झूले पर विराजमान करके उनके दर्शन करने से ब्रह्म हत्या समेत पांच पापों से भी मुक्ति मिलती है। भविष्य पुराण में श्रावण मास की श्रावणी पूर्णिमा तथा एकादशी से पूर्णिमा तक झूलन उत्सव और उससे संबंधित व्रत-पालन के निर्देश का जिक्र है।
वीरेन चंद्र गोराई, दुमका
कृष्ण-दोला उत्सव के साथ पवित्रारोपण और ऋषि-तर्पण की व्रत-विधियों को भी जोड़ा गया है। इससे उत्सव के धार्मिक और सामाजिक पक्ष का व्यापक स्वरूप सामने आता है। इसलिए यह जन-जन का उत्सव है।
सनातन सौ, समाजसेवी, दिगुली, रानीश्वर
झूलन यात्रा मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि ईश्वर कोई दूर बैठे कठोर शासक मात्र नहीं हैं बल्कि भक्ति के अनुराग से वे भक्त के हृदय-आनंद के झूले में स्वयं को बांधने के लिए भी सहर्ष तैयार होते हैं।
विनोद कुमार यादव, सेवानिवृत्त प्राध्यापक, जरमुंडी
