दुमका : संतुलित उर्वरक उपयोग विषय पर कृषि विज्ञान केंद्र दुमका में आयोजित जागरूकता कार्यक्रम को संबोधित करते वैज्ञानिक डॉ. श्रीकांत सिंह ने कहा कि असंतुलित उर्वरक एवं रासायनिक उर्वरक के अंधाधुंध उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरा शक्ति में कमी आ रही है। इससे मिट्टी में कड़ापन आ रहा है जो फसल के उत्पादन क्षमता को घटा रहा है। क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के सह निदेशक डॉ. बीपी साहा ने किसानों से अपील किया कि वह रासायनिक, कार्बनिक एवं जैविक स्त्रोत से संतुलित उर्वरक का ही उपयोग करें। बताया कि वर्मी कंपोस्ट फायदेमंद है। उसे तैयार करने में भी परेशानी नहीं होती है। डीडीएम नाबार्ड नवीनचंद्र झा ने कहा कि ड्रील एवं स्प्रिंकलर पद्धति से उर्वरक दक्षता में होनेवाले इजाफा के बारे में विस्तार से अपनी बातों को रखा। डॉ. सुनील कुमार ने तेलहन फसल की चर्चा करते कहा कि इसमें सल्फर का उपयोग 10 किलो प्रति हेक्टेयर किया जाना चाहिए। मृदा वैज्ञानिक ने भी रसायनों के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला। ईफको के क्षेत्रीय पदाधिकारी नवीन राय ने ठोस एवं तरल उर्वरकों की जानकारी दी। जिला कृषि पदाधिकारी सुरेंद्र कुमार सिंह ने उर्वरक लाइसेंस लेने की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। भारत सरकार के निर्देश पर आयोजित एक दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम में एक सौ से अधिक किसानों ने भाग लिया।

Posted By: Jagran

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