धनबाद, जेएनएन : जब भी साेशल ऑडिट का समय आता है विराेध, प्रदर्शन, हल्ला शुरू हाे जाता है। मनरेगा के बजाए ये लाेग शिक्षा क्षेत्र में सामाजिक काम करें ताे परिणाम कुछ बेहतर आएगा। इन लाेगाें काे मनरेगा की काेई विशेष जानकारी नहीं है। कहना था झारखंड स्टेट लाइवलीहुट प्रमोशन के राज्य समन्वयक गुरजीत सिंह का। उनके आम आदमी पार्टी से संबंध और जेएसएलपीएस के औचित्य पर उठ रहे सवाल पर सिंह का कहना था कि उन्होंने 2014 में ही चुनाव लड़ा था। हार के बाद पार्टी से इस्तीफा दे दिया। फिलवक्त किसी पार्टी के सदस्य नहीं हैं। गुरजीत के मुताबिक वे वर्ष 2016-19 में केंद्र सरकार के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलपमेंट (एनआइआरडी) के सलाहकार भी रहे। इसके बाद झारखंड में जेएसएलपीएस का दायित्व दिया गया। उन्हाेंने कहा कि इसमें विवादित कुछ भी नहीं है। प्राेफेसर्स भी पढ़ाते-पढ़ाते चुनाव भी लड़ते हैं और पार्टी के पदाधिकारी भी रहते हैं।

गुरजीत के मुताबिक वे यदि न भी रहें तो जेएसएलपीएस का काम रुकने वाला नहीं। व्यक्ति विशेष से कोई फर्क संस्था काे नहीं पड़ता। काेई दूसरा इस पद पर रहेगा। जब सरकार ने जेएसएलपीएस का गठन कर लिया है तो यह काम करेगा ही। यह नीतिगत मसला है इसे काेई बदल नहीं सकता। जहां तक सोशल ऑडिट की बात तो यह अब भी ग्रामसभा ही करती है। हम उसकी मदद करते हैं। एक घंटे में 200 योजनाओं से जुड़ी 2000 पन्नों की व्यवस्था ग्रामसभा नहीं कर सकती। हम ऑडिट से पहले का काम करते हैं। सारे कागजात तैयार कर ग्रामसभा काे देते हैं और फिर उनका काम शुरू हाेता है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उन्होंने सिर्फ मनरेगा के सेक्शन 17 को पढ़ा है जिसमें लिखा है कि ग्रामसभा सोशल ऑडिट करेगी। उन्हें सेक्शन 24 भी पढ़ना चाहिए। इसमें लिखा है कि केंद्र सरकार नियम बना सकती है। इसी के तहत वर्ष 2011 में केंद्र सरकार ने नियम बनाया। इसी नियम के तहत जेएसएलपीएस काम करता है। सोशल ऑडिट के तहत हमने 50 करोड़ रुपये की रिकवरी की पहचान की। इससे मनरेगा मजदूर से लेकर सरकार तक को फायदा हुआ है। बता दें कि ग्रामीण विकास श्रमिक संघ ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर जेएसएलपीएस से आडिट कराने को फिजूलखर्ची बताया था और गुरजीत सिंह के आम आदमी पार्टी का सदस्य रहते इसका समन्वयक बने रहने पर भी सवाल उठाए थे।

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