धनबाद [ नीरज दुबे ]। पिछले चार-माह से वर्तमान सरकार धनबाद के लिए ग्रामीण एसपी तलाश रही है, मगर वे मिल नहीं रहे। जिले में एसएसपी, सिटी व ग्रामीण एसपी पद की अधिसूचना जारी होने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि ग्रामीण एसपी के बगैर जिला चल रहा है। ग्रामीण एसपी का ज्यादातर कार्यक्षेत्र कोलियरी इलाका है। इलाके का कप्तान ही नहीं है तो कोयला चोरी होना भी लाजिमी है। ऐसे भी कुछ दिनों से जिला पुलिस बढ़ती घटनाओं के कारण परेशान है। हर दिन घटनाएं हो रही हैं। अपराधियों को पकडऩा तो दूर पुलिस का आधा वक्त जांच में ही बीत रहा है। कोलियरी इलाके में वर्चस्व को लेकर हर दिन गोलीबारी होती है, मगर डीएसपी के भरोसे ही इलाके की सुरक्षा सौंप दी गई है। एसएसपी साहब के आधे क्षेत्र की सुरक्षा कौन संभाले, यह चिंता का विषय बन गया है। इसका हल तो निकलना चाहिए। बहरहाल, झारखंड सरकार धनबाद ग्रामीण एसपी के लिए एक योग्य आइपीएस अधिकारी की तलाश कर रही है। मिलते ही पोस्टिंग होगी। तलाश पूरी होने तक इंतजार करना पड़ेगा। 

साहब तो ऊपर चले गए...
पहले कम पढ़े-लिखे लोग ही सिपाही बनते थे। अब तो स्नातक डिग्री वाले भी यह नौकरी कर रहे हैं। हालांकि पुलिस की नौकरी ऐसी है कि पढ़े-लिखे की भाषा भी बदल जाती है। खासकर सिपाही में बदलाव तो होता ही है। दो दिन पहले की बात है। एक इंस्पेक्टर के बॉडीगार्ड की बातों ने हैरान कर दिया। इंस्पेक्टर साहब के सरकारी मोबाइल पर एक शुभङ्क्षचतक ने फोन किया। फोन बॉडीगार्ड ने उठाया और कहा- साहब तो ऊपर चले गए। फोन करने वाला शख्स अवाक रह गया। कहा कि इंस्पेक्टर साहब से तो शाम में मुलाकात हुई थी। क्या बोल रहे हैं। तब सिपाही को समझ में आया कि क्या बोल गया। फिर अपनी बात स्पष्ट की। कहा- सर, ऊपरी तल्ले पर कमरे में आराम करने गए हैं। उधर से भी राहत की सांस ली गई। कहा- बात सुन कर तो दिमाग ही हिल गया था।

शहरी पर पड़े भारी

भाजपा ने शहरी और ग्रामीण जिलाध्यक्ष घोषित कर दिया है। कमेटी की घोषणा अभी बाकी है। इस बीच कार्यक्रम पर कार्यक्रम आ रहे हैं। शुरू में दोनों में अच्छी प्रतियोगिता रही, लेकिन इन दिनों ग्रामीण जिलाध्यक्ष भारी दिख रहे हैं। संयोग से कार्यक्रम भी उन्हीं के अनुरूप है। कृषि सुधार बिल के समर्थन में कृषि चौपाल और ट्रैक्टर पूजन का आयोजन रोज दो-तीन मंडलों में हो रहा है। महाशय हर जगह मौजूद रहते हैं। अब शहरी महोदय को समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। हालांकि उनके क्षेत्र में भी कई पंचायतें हैं। बावजूद मंडल कमेटियों को लेकर ऊहापोह के कारण कार्यकर्ता असमंजस में हैं। इसका फायदा ग्रामीण जिलाध्यक्ष को मिल रहा है। हद तो तब हो गई जब पार्टी के पुराने नेता होने के बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री के स्वागत में भी शहरी जिलाध्यक्ष पिछड़ गए। इसकी खूब चर्चा हो रही है। अफसोस तो होगा ही!

साहब की साइकिल और पुलिस
सिटी एसपी की साइकिल पुलिसकर्मियों के बीच चर्चित हो चुकी है। अधिकांश पुलिस वाले उनकी साइकिल अब पहचाने लगे हैं। पहचाने भी क्यों नहीं, उसी साइकिल की सवारी में तो कई बार शहर की पेट्रोङ्क्षलग टीम की गर्दन फांकीबाजी में फंस चुकी है। पहले पुलिसकर्मी साहब को गाड़ी पर देखते थे। स्कॉर्पियो दिखी नहीं कि सब अलर्ट। अब मुश्किल हो गई है। साइकिलों के बीच साहब की साइकिल पहचानना इतना आसान भी नहीं। ज्यादा परेशानी तो कुछ इधर-उधर करते पकड़े जाने की है। दो दिन पूर्व ही साहब देर रात जायजा लेने निकल पड़े। साइकिल में एलईडी बल्ब लगा था जो बाइक जैसी लाइट दे रहा था। कुछ देर बाद उनकी गाड़ी भी पीछे से पहुंच गई। सिटी सेंटर के पास हलचल होने लगी। इसी बीच डीएसपी महोदय भी आ गए। एसपी साहब खुद वाहनों को चेक भी करने लगे। रात में चैन उड़ गया।

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