धनबाद [दिनेश कुमार]: धनबाद के सदर अस्पताल में गुरुवार को हृदय दिवस मन रहा था। बैलून से बड़ा सा दिल बनाया गया। कर्मी से लेकर चिकित्सक तक लाल ड्रेस कोड में चहक रहे थे। पार्टी की भी तैयारी थी, मगर अचानक स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव धमक गए, अस्पताल का निरीक्षण करने। अब सरकारी अस्पताल और कुव्यवस्था का चोली दामन का साथ है, सो साहब को सब साफ-साफ दिख रहा था। बस साहब भड़क उठे। सबको तीन त्रिलोक दिखा डाले, अपनी खरी-खोटी से। बेचारे स्वास्थ्य विभाग वाले जिनका दिल बल्लियों उछल रहा था पार्टी की कल्पना से, धाड़ धाड़ बजने लगा। सबको ऐसा लगा, मानो दिल का दौरा आ गया। भुनभुनाते हुए लाल ड्रेस कोड उतार एप्रन पहनने लगे। साहब ने साफ कह दिया-फर्ज निभाएं, गरीबों का इलाज करें। कार्यक्रम की औपचारिता नहीं निभाएं। बाद में कई कानाफूसी करते दिखे, छिड़काव की सटीक व्यवस्था थी, निपट गई।

गुटखा ने दिया गम

यूं ही नहीं कहा जाता कि गुटखे का सेवन घातक है। कैंसर तो देता ही है, कई मौकों पर किरकिरी भी कराता है। बावजूद शौकीन कहां मानने वाले। जुबां को मिला केसर का स्वाद सुधरने का कहां मौका देता है। फुर्सत मिली नहीं कि पूरा पाउच अंदर, दम जालंधर। फिर गंदगी फैलाने वाले प्राणी बनने में देर नहीं करते। धकाधक पिच पिच। स्वास्थ्य विभाग के कार्यक्रम प्रबंधक का ही मामला देख लीजिए। गुरुवार को अपर मुख्य सचिव सदर अस्पताल पहुंचे। साहब हवाई चप्पल पहनकर मसाला पगुरियाते हुए पहुंच गए। साहब ने कुछ पूछा तो मुंह में भरी पीक के साथ ही जवाब देने लगे। फिर क्या, साहब की आंखें लाल, त्योरियां चढ़ गईं। प्रतिबंधित गुटखा का सेवन और वह भी उस विभाग के कर्मी द्वारा, जिस पर इसकी रोकथाम की जिम्मेदारी है। सो, महाशय से स्पष्टीकरण मांगा गया है। देखिए वह क्या सफाई दे पाते हैं।

काॅमरेड का भौकाल

काश यह दीवार काॅमरेड की जगह किसी और नेता के घर की होती तो सर्वहारा के समर्थन में लाल झंडा लेकर आसमान सिर पर उठा लिया जाता। विडंबना देखिए, दीवार काॅमरेड की ही गिर गई। महामंत्री काॅमरेड के घर की इस दीवार ने यात्री ढोने वाली एक कार पिचका दी। कुछ लोग दबने से भी बचे। अफरातफरी मची। जिसकी कार क्षतिग्रस्त हुई, उन्होंने हर्जाने के लिए काॅमरेड के घर दबिश दी। अब काॅमरेड पुराने चावल। भौकाल भी बनाए हैं, सो खुद हर्जाना देने का अनुभव था नहीं, बस तिलमिला गए। खुद पर आरोप कैसे बर्दाश्त करते। इसलिए तत्काल पुरानी ट्रिक अपना ली। सामने वाले के बोलते ही चढ़ जाओ। बोले दीवार गिरी तो गिरी, जर्जर थी। तुम तो जानते थे, फिर अपनी कार वहां खड़ी क्यों की। बेचारे गाड़ी वालों के होश फाख्ता। मुंह लटकाकर चले गए। क्या करते, लोग कह रहे, गरीब हार गया, काॅमरेड से।

खाकी का बस यही काम बाकी

अपराध छिपाने से नहीं, दबाने से खत्म होता है, पर पुलिस इसे मानने को तैयार नहीं। धोखा खा चुकी है, मगर आदत नहीं सुधार रही। कुछ दिन पहले की बात है। बरवाअड्डा के हीरक लिंक रोड पर एक युवक को अपराधियों ने पीटकर लूट लिया। रुपये ज्यादा नहीं थे। पुलिस ने घटना हल्के में ली। केस नहीं किया। फिर क्या, कुछ दिन बाद ही शहर के एक प्रसिद्ध हड्डी रोग विशेषज्ञ से वहीं पर लाखों लूट लिया गया। डाक्टर आंदोलन पर उतर आए। तब पुलिस ने दिन-रात एक कर अपराधियों को पकड़ा। ऐसा ही चल रहा है शहर के धैया रोड पर। गाहे-बगाहे अपराधी चलती बाइक से लोगों से छिनतई कर रहे हैं। कई घटनाएं हो चुकी हैं, पुलिस केस नहीं कर रही है। लोग कह रहे हैं शायद यहां भी पुलिस कुछ बड़ा होने का इंतजार कर रही है। देखिए क्या होता है।

Edited By: Deepak Kumar Pandey

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