धनबाद, [अजीत कुमार]। "ये जो दुनिया है ना वो एक नहीं तीन दुनिया है। सबसे ऊपर स्वर्गलोक जिसमें देवता रहते हैं। बीच में धरती लोक जिसमें आदमी रहते हैं और सबसे नीचे पाताललोक जिसमें कीड़े रहते हैं।" यह डायलोग एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा के होम प्रोडक्शन से बनी वेब सीरीज 'पाताललोक' की है, जिसकी इन दिनों खूब चर्चा हो रही है। इस वेब सीरीज में झारखंड के जमशेदपुर के रहनेवाले नीरज काबी (वेब सीरीज में जर्नलिस्ट संजीव मेहरा) ने काफी अहम रोल किया है जिसकी खूब तारीफ हो रही है। नीरज काबी ने इससे पहले वेब सीरीज सेक्रेड गेम्स, फिल्म हिचकी व तलवार आदि में काम किया है। वेब सीरीज के भविष्य और झारखंड जैसे राज्य से मुंबई तक का सफर उन्होंने कैसे तय किया इसपर दैनिक जागरण से नीरज काबी ने खास बातचीत की।

अलग तरीके का है 'पाताललोक' का ग्राफ : मैं हर वो काम करता हूं जो अपने आप में अलग होता है। मैं रिपीट नहीं करता हूं। 'पाताललोक' की बात ये है कि इस वेब सीरीज का ग्राफ अलग तरीके का है। इसको देखने के बाद ही पता चलेगा। इस तरीके का काम मैंने पहले कभी नहीं किया। 'पाताललोक' का स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मैंने सबसे पहले डायरेक्टर और राइटर से पूछा कि यह रोल (हाथी राम का) किसे दिया गया है? मतलब स्क्रिप्ट पढ़कर ही मुझे पता चल गया था कि यह किरदार वाकई में कुछ अलग है। हालांकि यह रोल जयदीप अहलावत (वेब सीरीज में हाथी राम) को दिया गया था। उसने जो काम किया वो एक अलग ही तरीके का है।

शुरू से नाटक और एक्टिंग के तरफ था रुझान : मुझे 22-23 साल लग गए स्ट्रगल करते हुए। मैं झारखंड के जमशेदपुर का रहनेवाला हूं और वहां से पुणे गया था ग्रैजुएशन करने के लिए। इस फिल्ड के लिए 1991 से लगा हूं। मैं अपनी तरफ से 22 साल ही कहता हूं, लेकिन देखा जाए तो 30 साल हो गए हैं। तभी से मेरा मन था कि मैं एक्टिंग करुं। नाटक के तरफ भी रुझान काफी था। मैं स्कूल में, कॉलेज में नाटक वगैरह करता था।

ओड़िया भाषा में की पहली फिल्म, वहीं से करियर शुरू : 1997 में मैं एक टेलीविजन सीरियल कर रहा था, जिसकी डायरेक्टर सुमित्रा भावे थीं। उस वक्त एनएसडी (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा) के जितने भी बड़े एक्टर थे उनके साथ काम करने का मौका मिला। मुझे काफी छोटा किरदार दिया गया था। इसकी शूटिंग किसी गांव में हुई थी। शूट पूरा करने के बाद लास्ट दिन मैं पुणे के लिए निकलने वाला था। तभी साथ में काम करनेवाले लोगों ने कहा कि कहां जाओगे यार रुक जाओ, यार रात को बातें-वातें करेंगे और सुबह बस से निकल जाना। एनएसडी के लोग भी वहीं थे। मैं रुक गया और फिर बातें होने लगीं।

कुछ लोग वहां डिस्कस कर रहे थे कि एक अपूर्वा किशोर बीर नाम के डायरेक्टर हैं वो एक ओड़िया फिल्म करना चाह रहे हैं। वो किसी ऐसे यंग एक्टर को कास्ट करना चाहते हैं जो ओड़िया बोल सके और छऊ नृत्य कर पाए। इतना सुनते ही मुझे लगा कि इससे बढ़िया मौका मेरे लिए और क्या हो सकता है। मैं अगले ही दिन सुबह सांताक्रुज के लिए भागा। जहां वे रहते थे। तो वहां उन्होंने मुझसे एक्टिंग करवाई। फिर डांस भी करवाया। डायलॉग दिए ओड़िया में कि इसे करके दिखाओ। मैंने सब किया। कुछ दिनों बाद उन्होंने कॉल किया और बोला आ जाओ मुंबई। मैं गया और फिर वहीं से सिलसिला शुरू हो गया। वो पहली फिल्म थी "शेशो द्रुस्ति" जो ओड़िया में थी। हालांकि अपने फोटोग्राफ्स लेकर कई-कई घंटों तक ऑडिशन देने के लिए मैं लाइन में खड़ा रह चुका हूं। एक लाइन के डायलॉग के लिए आपको घंटों इंतजार कराया जाता है। मिले तो मिले और नहीं मिले तो नहीं मिले।

पांच रुपये की वजह से एनएसडी में नहीं मिला एडमिशन : मैंने अपने दोस्तों को भी देखा था कि वो भी ऐसे ही करते थे और कुछ नहीं होता था। शाम को पृथ्वी थियेटर जाकर चाय पीते थे और सिगरेट फूंकते थे, लेकिन इससे तो कुछ होने वाला नहीं था। तो मैं वहां उस क्राउड से निकल गया। फिर मैंने थियेटर करना शुरू किया। मैंने 1994 में एनएसडी के लिए अप्लाई भी किया था। उस वक्त पोस्टल ऑर्डर 10 रुपये का था, फिर उसे दस से 15 कर दिया गया था। मैंने दस रुपये का भेजा था तो एनएसडी से फॉर्म को लौटा दिया गया। तो वहां पांच रुपये की वजह से एडमिशन नहीं हो सका।

अपनी जिंदगी खुद बनाने का लिया निर्णय : मैंने एक-एक चीज को सीखा। फिजिकल ट्रेनिंग, छऊ डांस, मार्शल आर्ट्स इन सब चीज को सीखा। इसके अलावा कास्ट को समझने की कोशिश की। ये समझा कि एक्टिंग करते कैसे हैं। तो मैंने यह सोच लिया था कि अब अपनी जिंदगी खुद ही बनानी पड़ेगी। उसके बाद ही कुछ होगा। इसके अलावा जीने के लिए मुझे बहुत कुछ करना पड़ा वो मैं बता नहीं सकता। बस ये था कि कुछ भी कर लूं ताकि मुंबई में रह सकूं।

एक्टिंग में जाने लिए टेक्निक सीखें और ट्रेनिंग करें : मैं एक्टिंग का कोच भी हूं। मेरा मानना है कि अगर किसी को एक्टिंग में करियर बनाना है तो यूं ही जिम जाकर बॉडी बनाने से या फेस (चेहरे) के ऊपर काम करने से कुछ नहीं होगा। कुछ लोग ऐसा ही करते हैं और अपने फोटोग्राफ्स लेकर मुंबई पहुंच जाते हैं। इससे कुछ नहीं होगा। इसके लिए बकायदे आपको एक्टिंग के टेक्निक सीखने होंगे। थियेटर करना होगा, तब ही आप एक बेहतर एक्टर बन सकते हैं या इस क्षेत्र में करियर भी बना सकते हैं। अगर आपके पास कला है तो मेरा मानना है कि लोग आपको पहचानना शुरू कर देंगे। मैं ये अपनी बात ही कर रहा हूं। ये तजुरबा है मेरा। मुंबई में लाखों में ऐसे लोग आते हैं। इसलिए खुद को कैसे अलग करें, इसपर काम करना होगा।

एनएसडी से निकलने के बाद राह आसान : एनएसडी के लोगों के लिए थोड़ा आसान जरूर हो जाता है। ज्यादातर अच्छे एक्टर एनएसडी के ही हैं। यहां से निकलने के बाद राह आसान हो जाता है। मैंने कई बार ऑडिशन के समय यह भी देखा है कि जब अंदर से ऑडिशन देने के लिए बुलाया जाता था। लोग पूछते थे कि भाई एनएसडी से कौन-कौन है? तो यब सब सुनकर लगा कि हां एनएसडी से काम आसान हो जाता है। कई लोगों को ऐसे ही पास भी कर दिया जाता था और पूछा भी जाता था कि तन्ख्वाह कितनी लोगे भाई। उस समय लगता था कि अगर एनएसडी गया होता तो कुछ बात बन सकती थी।

गांव से मुंबई आने वाले थियेटर-नाटकों के बारे में जरूर पढ़ें : एफटीआइआइ में भी गया लेकिन एडमिशन नहीं हो सका, लेकिन आज यहां तक अपनी मेहनत से पहुंच गया हूं तो यह देखकर आज अच्छा लगता है। तो बाहर से आनेवाले या जो गांव में रहते हैं उन्हें इस फिल्ड में आना हो तो वे थियेटर करें, एनएसडी जाएं या एफटीआइआइ जाएं। तो कुछ हो सकता है। क्राफ्ट सीखना चाहिए। तब ही लोग (डायरेक्टर, राइटर) मुंबई में आपको रेस्पेक्ट देंगे। नाटकों के बारे में पढ़ना होगा। टेक्निक्स को देखना होगा। पिक्चर देखकर या किसी एक्टर को देखकर कुछ नहीं सीख सकते।

एक्टर और एंटरटेनर को समझना होगा : अगर आप इस फिल्ड में आना चाहते हैं तो पहले आपको एक्टर और एंटरटेनर में फर्क समझना होगा। ये दोनों दो अलग-अलग चीजें हैं। एंटरटेनर सिर्फ शरीर के साथ काम करता है। वो गुड लुक्स यानी चेहरे पर काम करता है। वो दिखने में अच्छा हो सकता है। वही लोग एंटरटेनर बन सकते हैं। इस तरह से आप स्टार बन सकते हैं। इसकी तैयारी अलग है। इनका काम भी अलग है। हां, अगर सिर्फ एक्टिंग करनी है तो फिर यह दूसरी बात है। आप इसके लिए नशरुद्दीन शाह, इरफान खान, पंकज कपूर को देखिए। ये हैं एक्टर। इसलिए मैं कहता हूं कि एंटरटेनर और एक्टर दोनों अलग-अलग चीजें हैं। अगर ये काम आपको करना है तो फिर सीखना होगा और ये बहुत लंबा सफर होता है। उम्मीद को नहीं तोड़ें और इसमें लगे रहें तभी हो सकता है कुछ।

फिल्मों पर हावी नहीं होगी वेब सीरीज : मुझे लगता है कि वेब सीरीज या कहीं भी जातिसूचक शब्द का जो इस्तेमाल हो रहा है उसे नहीं होना चाहिए। कई लोग जाति पर या धर्म के नाम पर डायलॉग लिख रहे हैं या लिखते हैं, तो उन्हें समझना चाहिए और इसके बारे में सोचना चाहिए। हालांकि वेब सीरीज का अपना अंदाज है इसलिए वो फिल्मों पर कभी हावी नहीं होगा। वेब सीरीज या कहीं भी एडल्ट सीन दिखाने की अगर बात है तो यह सही है कि कई चीजों को हमें दिखाना जरूरी होता है। हां, ये है कि उसके तरीके कुछ और हो सकते हैं। आर्ट डायरेक्टर दूसरे तरीके से इसे दिखा सकता है। आर्ट में यह क्षमता है कि चीजों को जैसे चाहें आप दिखा सकते हैं।

कोरोना के साथ जीना पड़ेगा : लॉकडाउन में मेरा पर्सनल समय कैसा कट रहा है इसपर मैं ज्यादा ध्यान नहीं देता। देश ही नहीं बल्कि दुनिया में जो अभी हालात हैं, जिस तरह से लोग बीमार हो रहे हैं और लोगों की मौत हो रही है, यह बेहद दुखद है। मैं इनके लिए रोजाना प्रार्थना करता हूं। इस समय जो सही मायने में बाहर काम कर रहे हैं, जैसे डॉक्टर, नर्स और सफाईकर्मी, इनकी चर्चा होनी चाहिए। अब हमें नए तरीके से जीने की आदत डालनी होगी। क्योंकि कोरोना इतना जल्दी खत्म नहीं होगा। हमें इसी के साथ पूरी सतर्कता के साथ जीना सीखना होगा।

Posted By: Sagar Singh

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