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धनबाद, बलवंत कुमार। बंगाल का अंग रहने के कारण धनबाद में भी दुर्गोत्सव धूमधाम से मनाने की परंपरा है। पूजा से छह माह पहले ही पंडाल और मूर्ति बनाने का काम प्रारंभ हो जाता है। पाल के अनुसार अप्रैल माह में मूर्ति निर्माण के लिए बांस, लकड़ी, रस्सी और पुआल का काम शुरू कर दिया जाता है। समय बीतने के साथ मिट्टी और रंग-रोगन का काम होता है।

मेदनीपुर का बांस और डायमंड हार्बर की मिट्टी : प्रतिमा निर्माण के लिए बांस और मिट्टी आवश्यक सामग्री में से एक है। बांस जहां पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर से मंगाया जाता है। वहीं मिट्टी नवदीप और डायमंड हार्बर से खरीद कर लायी जाती है। पाल बताते हैं कि एक ट्रक मिट्टी की कीमत 25 से 30 हजार रूपये तक होती है। यह मिट्टी गंगा की होती है। वेश्यालय की मिट्टी के उपयोग की बात को दुलाल पाल नकारते हैं। लेकिन वे मानते हैं कि गंगा की चिकनी मिट्टी उसी जगह से ली जाती है, जहां वेश्याएं स्नान करती हैं। इसके अलावा स्थानीय पीली मिट्टी का भी उपयोग किया जाता है।

दस हजार से तीन लाख तक की मूर्ति: दुलाल पाल के यहां बनी मूर्तियां दस हजार से लेकर तीन लाख रुपये तक में बिकती हैं। महंगी मूर्तियों का निर्माण ऑर्डर पर किया जाता है। पाल बताते हैं कि इस बार सबसे महंगी मूर्ति का आर्डर बिहारशरीफ पूजा कमेटी की ओर से मिला है। इस मूर्ति की कुल लागत तीन लाख रुपये तक है।

झारखंड समेत बिहार-बंगाल में जाती हैं मूर्तियां : पाल ने बताया कि धनबाद में बनी मां दुर्गा की प्रतिमा झारखंड में धनबाद के अलावा कोडरमा, गिरिडीह तक जाती हैं। इसके अलावा बंगाल में आसनसोल और बिहार में नालंदा, बिहारशरीफ की पूजा कमेटियां यहां से मूर्ति ले जाती हैं।

डिजाइनदार मूर्तियों की मांग: वर्तमान समय मे फैशनेबल और डिजाइनदार मूर्तियों की अधिक मांग है। पाल बताते हैं कि पहले मूर्तियों में कपड़ा और बाहरी सजावटी समान का उपयोग किया जाता है, लेकिन अब इनका उपयोग नहीं होता। मिट्टी के ढांचा और हाथ की कलाकारी से ही मूर्तियों को सजाया जाता है। अजंता डिजाइन अत्यधिक पसंद की जा रही हैं।

थीम आधारित मूर्तियों की भी मांग : दुलाल पाल के अनुसार किसी थीम अथवा विषय आधारित मूर्तियों की भी काफी मांग है। इस बार धनसार पूजा कमेटी ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वृक्ष बचाओ की थीम पर मूर्ति का निर्माण करने का आर्डर दिया है। कुछ जगहों से पंडाल की थीम को ध्यान में रखकर प्रतिमाएं बनायी जाती हैं।

बाहर से भी आते कलाकार : दुलाल पाल के यहां मूर्तियां बनाने के लिए पश्चिम बंगाल के कलाकार भी आते हैं। जो अप्रैल माह से लेकर नवंबर तक धनबाद में रहकर मां दुर्गा और काली की प्रतिमा का निर्माण करते हैं। इसके बाद वे अपने घर वापस चले जाते हैं।

पाल के पिताजी ने 1947 में शुरू किया काम : दुलाल पाल बताते हैं कि मूर्ति निर्माण कार्य की शुरूआत उनके पिता स्व. सीतानाथ पाल ने प्रारंभ किया था। 1947 में वे लोग धनबाद आए थे और पिताजी ने जीविकोपार्जन के लिए इसी कला का चयन किया। पिताजी के साथ दुलाल पाल भी इसी में रम गए और आज इनके दोनों पुत्र अभिषेक और अभिजीत भी सहयोग कर रहे हैं। पाल का मानना है कि दिन प्रतिदिन मूर्ति कला महंगी होती जा रही है। ऐसे में इससे ज्यादा दिन तक लगाव रख पाना संभव नहीं है। इसके बावजूद भी वे अपनी जिंदगी इसी क्षेत्र में समर्पित करना चाहते हैं। बच्चे भले ही आगे चलकर कुछ और सोचें।

Posted By: Jagran

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