मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

धनबाद, राजीव शुक्ला। मैं बेजान हूं, निष्प्राण हूं क्योंकि एक कुर्सी हूं। मगर, जान लें कि मैं बेहद भाग्यशाली हूं। इसका हमें गर्व है कि राष्ट्रपति महात्मा गाधी को अपनी गोद में आश्रय देने का मुझे सौभाग्य मिला। मैं उस ब्लैंक चेक की साक्षी हूं जो झरिया के दानवीर रामजस अग्रवाल ने महात्मा गाधी को श्रद्धा के साथ भेंट किया था। भाव भंगिमाओं को व्यक्त करने की क्षमता होती तो मैं बेशक झूमकर नाचती, गाती और इतराती। वे लम्हे जिनमें बापू का सानिध्य मिला उनसे मेरे जीवन की दिशा ही बदल गई।

आइए सुनिये मेरी कहानी। बात 1922 की है। उस समय मैं रामजस अग्रवाल की झरिया के लक्ष्मीनिया मोड़ स्थित हवेली के मेहमानखाने में रहती थी। वह दौर स्वतंत्रता आदोलन का था। महात्मा गाधी इसके नायक थे। देश का हर शख्स इस लकुटी वाले की सादगी और आदर्शो का कायल था। सत्य और अ¨हसा के इस पुजारी को देखने की चाह सभी को थी। क्या मालूम था कि हमें उनके दर्शन ही नहीं अपनी गोद में आश्रय देने का मौका मिलेगा।

दरअसल, गया में 1922 के दिसंबर में भारतीय राष्ट्रीय काग्रेस का अधिवेशन होना था। आर्थिक संकट मुंह बाए खड़ा था। तब बापू ने रकम की व्यवस्था का बीड़ा उठाया। देशबंधु चितरंजन दास के साथ वे निकल पड़े। देशबंधु ने महात्मा को बताया कि झरिया के रामजस अग्रवाल से मदद मिल सकती है। दोनों महानुभाव झरिया पहुंचे। आज भी वह दिन याद है। हवेली में चहलपहल थी। अचानक गहमागहमी बढ़ी और आ गए बापू का शोर मचा। गाधीजी को मेहमानखाने में लाया गया। मैं एकबारगी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई। यह तो कल्पना से परे था, महात्मा के दर्शन हो रहे थे। धोती और लकुटी धारण करने वाले राष्ट्रपिता साक्षात सामने थे। उन्हें जो कुर्सी दी गई वह मैं ही थी। अपने भाग्य पर इतरा उठी। बापू ने सेठ रामजस को बताया कुछ रकम की जरूरत है।

जब संकोच में पड़ गए सेठ रामजस: हमारे सेठ भी संकोच में पड़ गए कि महात्मा खुद आए हैं। कितनी राशि दें। अंतत: बड़ा निर्णय लेकर उन्हें ब्लैंक चेक दे दिया। बाद में उसमें 50 हजार की रकम भरी गई। मैं तो रीझ गई अपनी किस्मत पर कि इन अनमोल लम्हों की गवाह बन सकी। महात्मा चले गए मगर मेरा भाग्य बदल गया। अब हमारा प्रयोग नहीं, सम्मान होने लगा। रामजस की आने वाली पीढि़यों ने भी इसे जारी रखा। गत वर्ष सेठजी के जीवन पर साहित्यकार बनखंडी मिश्र ने पुस्तक लिखी। उन्होने सेठजी की वर्तमान पीढ़ी के दिलीप अग्रवाल से हमारी माग कर दी। हम साहित्यकार के घर आ गए। यहा भी वही मान सम्मान और इज्जत।

दक्षिण भारत ¨हदी प्रचार सभा ने की मेरी माग: मैं धरोहर बनी तो पूछ बढ़ी। दक्षिण भारत ¨हदी प्रचार सभा, मद्रास की स्थापना महात्मा गाधी ने वर्ष 1918 में की थी। इस साल इसका शतमानोत्सव वर्ष है। सभा में जिस भवन में गाधीजी रहे, उसे सरकार ने हेरिटेज साइट घोषित किया है। इसमें उनसे संबंधित वस्तुएं संग्रहीत की जा रही हैं। सभा के जनसंपर्क अधिकारी ईश्वर वरुण और विशेष अधिकारी के दीनबंधु ने साहित्यकार से हमारी माग की है। यह कहते हुए कि संग्रहालय में आपके पूर्ण विवरण के साथ कुर्सी प्रदान करने का अभिलेख रखा जाएगा। आखिर अब मैं देश की धरोहर बन चुकी हूं। मुझे वह सम्मान मिला, जिसकी कल्पना कोई कुर्सी तो नहीं कर सकती। सिर्फ महात्मा की बदौलत। उन्हें शतशत नमन।

Posted By: Jagran

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