आशीष सिंह, धनबाद : धनबाद का वासेपुर। इस इलाके पर एक पिक्चर बनी थी गैंग्स ऑफ वासेपुर। नतीजा यहां की चर्चा होते ही हर जेहन में गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठती है। पर जान लें कि यहां से तालीम से रोशन हो कई ऐसी शख्सियतें भी निकलीं जो दुनिया में परचम फहरा रही हैं। ऐसी ही एक प्रतिभा है वासेपुर रहमतगंज के मो. शाहिद आलम। बचपन से ही गरीबी देखी। तालीम का महत्व जाना। बस क्या था, पढ़ाई में जुट गए। मेहनत रंग लाई और इंडियन फॉरेन सर्विस की परीक्षा में सफलता मिल गई। 2010 बैच के इस आइएफएस अधिकारी को हाल में ही जेद्दा सऊदी अरब में काउंसिल जनरल ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी सौंपी गई है। शाहिद ने दिखा दिया है कि लगन और मेहनत के बल पर हर लक्ष्य साधा जा सकता है। शाहिद बताते हैं कि अपने घर से आठ किमी दूर झरिया के इंडियन स्कूल ऑफ लìनग पढ़ने जाते थे। वहा से दसवीं की पढ़ाई की। फिर आइएसएल भूली से 12 वीं कर दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक की डिग्री ली। बचपन से मेधावी थे तो छात्रवृत्ति मिल गई। संघ लोक सेवा आयोग की तैयारी जी जान से की। पिता मो. शमीम की वासेपुर में कपड़े की एक छोटी सी दुकान है। उन्होंने हमेशा उत्साह बढ़ाया और हर जरूरत को पूरा किया। हिदुस्तानी होने का है गर्व : इस्लाम तालीम के नूर में आलोकित होने का संदेश देता है। इसे आत्मसात किया और सफलता पाई। सऊदी में बसे करीब 12 लाख हिंदुस्तानियों को हर मदद करेंगे। कामगार वर्ग की जरूरतें और मुश्किलें मैं खुद समझता हूं। इन्हें भारत सरकार की ओर से हर मदद दिलाएंगे। अक्सर सुनता हूं कि मुस्लिमों से भेदभाव किया जाता है। 2010 से इस सेवा में हूं, आज तक मुझे तो ऐसा नहीं लगा। हिदुस्तान में मुस्लिमों को पूरा सम्मान मिलता है। इतने कम समय में हमें इस अहम ओहदे से नवाज दिया गया, यह आपको हिंदुस्तान के अलावा और कहीं देखने को नहीं मिलेगा। मुझे हिंदुस्तानी होने पर गर्व है। अरब गए तो सीख ली अरबी भाषा : शाहिद जब 2012-14 में भारतीय दूतावास कैरो में कार्यरत थे, तब अरबी भाषा का प्रशिक्षण लिया। सऊदी अरब में शाहिद ने डिप्टी काउंसिल जनरल और हज काउंसिल के पद पर भी सेवा दी है। उनकी पत्नी डॉ. शकीला खातून, पिता मो. शमीम, मा निकहत सलमा और भाई असीम रजा को शाहिद की इस सफलता पर गर्व है।

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