झारखंडधाम [ विवेकानंद सिंह ]। छत विहीन मंदिर में विराजमान बाबा झारखंडी नाथ महादेव की कृति महान है। शुक्रवार को महाशिवरात्रि पर यहां मंदिर में बाबा को जलाभिषेक के लिए आसपास के अलावा दूसरे प्रदेश के श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। कहा जाता है कि महाभारत काल में भगवान शिव ने किरात वेष धारण कर अर्जुन को पाशुपत अस्त्र यहीं प्रदान किया था। उनकी भौगोलिक स्थिति आज भी वर्तमान में प्रमाणित है।

झारखंधाम महाभारत काल में जंगल झाड़ से पटा हुआ था। यहां का शिवलिंग द्वादश ज्योतिर्लिंग से अलग जागृत अवस्था में स्वयंभू के नाम से जाना जाता है। पाषाण काल में चरवाहा जंगल में बेर तोड़ते थे। फिर शिवलिंग पर बैठकर खाते थे। सहसा एक दिन बैठकर बैर खाने के दाैरान बगल से खून का फव्वारा निकलने लगा। यह देखकर लोग चकित हो गए। यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। उस दिन से बाबा यहां विख्यात हो गए। फिर लोग पूजा-अर्चना करने लगे तथा भक्तों की मनोकामना यहां पूर्ण होने लगी और महादेव किरात वेष शिव के नाम से जाने जाने लगे।

सैकड़ों धरनार्थी रहते बाबा की शरण में

झारखंडधाम गिरिडीह जिले के जमुआ-राजधनवार मार्ग पर स्थित है। इस पवित्र आस्था की नगरी में सैकड़ों धरनार्थी बाबा के दरबार में फलाहार पर रात दिन रहते हैं। मनोकामना पूर्ण स्वप्न के जरिए होने पर वे अपने घर चले जाते हैं। पुत्र प्राप्ति व रोग मुक्ति और धन यश की प्राप्ति के लिए धरनार्थियों का जमावड़ा यहां लगता है। यहां सालों भर भक्तों का तांता लगा रहता है। मुंडन, जागरण, यज्ञोपवीत, अनुष्ठान जैसे पवित्र कार्य के लिए अपने राज्य के अलावा बिहार, यूपी आदि राज्यों से लोग पहुंचते हैं जिससे उनकी मनोकामना पूर्ण होती है।

छत विहीन मंदिर में विराजमान है शिवलिंग

यहां शिवलिंग छतविहीन मंदिर में विराजमान है। कई बार भक्तों ने छत बनाने का प्रयास किया लेकिन वह प्रयास विफल साबित हुआ। यहां बाबा छत विहीन मंदिर में ही रहना पसंद करते हैं। सोमवार तथा पूर्णिमा के दिन भी उमड़ती भीड़: सोमवार तथा पूर्णिमा को भी भक्तों की भीड़ यहां लगी रहती है। वहीं पूरे सावन माह में कांवरियों का जत्था यहां पहुंचता है। अधिकांश लोग गंगाजल लेकर यहां जलार्पण करते हैं। फिर विवाह मुहूर्त में हजारों जोड़े परिणय सूत्र में बंधते हैं। मंदिर परिसर में बाबा मंदिर के अलावा पार्वती मंदिर, काली मंदिर, दुर्गा मंदिर, सरस्वती मंदिर सहित अनेकों मंदिर हैं।

महाशिवरात्रि पर दो दिवसीय मेला

महाशिवरात्रि पर यहां शिव विवाह का नजारा अनोखा लगता है। विवाह के लिए योग्य पंडितों को वाराणसी से बुलाया गया है। यहां के पुजारियों द्वारा शिव पार्वती को गंगाजल से स्नान कराकर विवाह रचाया जाता है। विवाह की रात भूत, बेताल, देव, गंधर्व आदि की झांकी यहां से निकाली जाती है। मंदिर परिसर को रोशनी से चकाचौंध कर गाजे-बाजे के साथ विवाह रचाया जाता है। मौके पर दो दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में हजारों की भीड़ होती है खेल तमाशा मेले की शोभा बढ़ाते हैं। आयोजन में यहां की दोनों समिति के लोग तथा पुजारियों में कृष्ण कुमार पंडा, नरेश पंडा, मनोज पंडा, सुभाष पंडा, नंदकिशोर पंडा, अशोक पंडा, नकुल पंडा, भीम पंडा, सुरेश पंडा, अंबिका पंडा, बैजनाथ पंडा, धनेश्वर पंडा, सुरेश वर्मा, आशुतोष कुशवाहा सहित अन्य लोग जुटे रहते हैं।

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