जासं, झरिया (धनबाद)। झरिया के ताराबगान में रहने वाले गरीब रिक्शा चालक बैजनाथ रविदास की भूख व इलाज के अभाव में बीमारी से मौत के बाद धनबाद से लेकर रांची तक सरकारी अमला रेस हो गया है। अब बचने और बचाने का खेल शुरू हो गया है। एक ओर जहां अधिकारियों की फौज भूख की बात को झुठलाने के लिए कोई प्रयास नहीं छोड़ रही है, वहीं दूसरी ओर भूख आग पर राजनीतिक रोटी सेंकने का भी खेल शुरू हो गया है।

मामले की जांच को रविवार को मृतक बैजनाथ के आवास पर प्रशासनिक अमला पहुंचा था। परिजनों से अकेले में ही बात की। किसी बाहरी आदमी को घर के अंदर नहीं आने दिया गया। बाद में प्रशासन की ओर से दावा किया गया कि घर में पत्नी समेत चार लोग कमाने वाले हैं। ऐसे में राशन की कमी और भूख से मौत की की बात सरासर गलत है। वहीं बैजनाथ के परिजन अधिकारियों के दावे को सफेद झूठ करार दे रहे हैं।

जानिए, क्या कह रहे हैं परिजन:

प्रशासन की ओर से बताया गया कि मृतक बैजनाथ की 'कमाऊ' पत्नी पार्वती देवी चौका बर्तन का काम करती है। इस पर पार्वती का कहना है कि पति व बच्चों के पेट की आग बुझाने के लिए चौका-बर्तन से उसे कुछ ही रुपये मिल पाते थे। यह राशि बीमार पति के इलाज व सभी सदस्यों के लिए अपर्याप्त थी। प्रशासन उसके दो बेटों को भी कमाऊ बता रहा है, जबकि सच्चाई कुछ और है। बड़ा पुत्र रवि (18 वर्ष) काम की तलाश में एक माह पूर्व बोधगया नानी घर गया था। लेकिन वहां कोई काम नहीं मिला। बैठा रहता था। दूसरा नाबालिग पुत्र सूरज 15 वर्षीय यहीं घर पर ही रहता था और पिता की देखभाल करता था। कोई काम नहीं करता था।

बड़ी बेटी सुमन 17 वर्षीय घर पर ही रहती है। कोई काम नहीं करती है। एक पुत्र नीरज 12 वर्ष वर्ग पांच व छोटी पुत्री 10 वर्षीय सुलेखा वर्ग चार डीएवी स्कूल झरिया में पढ़ती है। पति की भूख व बीमारी से मौत को जिस प्रकार प्रशासन झुठलाने में लगा है, उससे हम बहुत दुखी हैं। हमने कहा था कि पापा भूख से मर गए। उस दिन बगल से खाना लेकर घर आए थे। पापा उसे नहीं खा पाए। मां भी प्रसाद लाई थी, लेकिन पापा वह भी नहीं खा पाए थे। शनिवार को बैजनाथ की पत्नी को कमर में चोट लगने के कारण वह बिस्तर पर ही पड़ी थी। जो भी आ रहे थी, उनसे लेटे-लेटे ही बात कर रही थी।

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Posted By: Sachin Mishra

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