धनबाद [ राजीव शुक्ला ]। देश की कोयला राजधानी के निरसा, झरिया से कतरास तक हर माह कोयला के अवैध खनन में लोग मर रहे हैं। एक के बाद एक मौत, उसके बाद भी खुलेआम कोयला चोरी हो रही है। बीसीसीएल और ईसीएल के अफसर, सभी राजनीतिक दलों से जुड़े लोग, जिला प्रशासन और पुलिस के छोटे से लेकर बड़े अधिकारी, खनन महकमा और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के जवानों से लेकर अफसरों को इंसान की जान की परवाह नहीं है। सबको अपना हिस्सा चाहिए।

एक साल में सिर्फ निरसा में 22 काल की गाल में 

सिर्फ निरसा इलाके में एक साल में बंद या चालू खदानों में बनाई गई अंधी सुरंग से कोयला निकालने में 22 लोग जान गंवा चुके हैं। झरिया और कतरास इलाके में भी कुछ बोरी कोयला के लिए जान गई है। न कंपनी के भीतर हलचल, न सरकारी महकमे में तनिक भी दर्द। दुखद पहलू यह भी है कि कोयला चोरी के दौरान लोग मरते हैं तो उनके परिजन शव लेकर भाग जाते हैं। प्राथमिकी तक दर्ज नहीं कराते। यदि केस करना जरूरी हो गया तो खदान के नजदीक शौच के दौरान कोयला का भंडार गिरने से मौत की बात दर्ज करा दी जाती है। ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि अवैध खनन के दौरान मौत होने पर शव मिल गया तो परिवार वाले मुकदमे में फंस जाएंगे। इसी डर से केस भी दर्ज नहीं हो पाता। तस्कर चोरी के इस कोयले को दो रुपये किलो में खरीदते हैं और सात रुपये प्रति किलो बेच मालामाल होते हैं। न तस्कर मरते हैं, न अफसर।

अवैध खनन में मरते ही लाश गायब 

ईस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड (ईसीएल) के मुगमा क्षेत्र की कापासारा कोयला परियोजना में बुधवार को अवैध खनन के दौरान पांच लोग दब गए थे। दो की मौत हो गई। पिछले एक माह पर गौर करे तो इस तरह की पांच घटनाएं हो चुकी हैं। निरसा से लेकर झरिया और कतरास तक कहीं भी जाइए, साइकिल और बाइक पर कोयला लाद कर कोयला भट्ठों तक पहुंचाने की होड़ दिखती है। पानी से भरे बंद खदानों में सुरंग बना कर लोग घुस रहे हैं। कोयला की चïट्टान को तोड़ते हैं। जिंदा बाहर आ गये तो रोटी का इंतजाम हो गया। मर गए तो उनकी लाश गायब कर दी जाती है। परिजन की मौत से परेशान उस परिवार के दर्द पर कोई मरहम नहीं लगाता। झरिया के राजापुर में अवैध खनन में मरने वाली बच्ची चंदा और युवक पंकज का परिवार आज मुफलिसी का जीवन गुजार रहा है।

बंगाल-वाराणसी की मंडियों में खपाया जाता है कोयला

अवैध कोयला को तस्कर वाहन व नाव के जरिए बाहर भेजते हैं। चोरी का कुछ कोयला यहां के अवैध भट्ठों में खप जाता है। बड़ी मात्रा में कोयला फर्जी कागजात के जरिए डेहरी ऑन सोन या वाराणसी भेजा जाता है।  बलियापुर, भौंरा समेत दामोदर नदी के किनारे बसे इलाके से कोयला नाव के जरिए पहले बंगाल भेजा जाता है। वहां से वाराणसी जाता है।

इन नियमों का पालन होता तो नहीं मरते लोग

अनुज्ञप्ति मिलने के बाद कोयला खदान की घेराबंदी होनी चाहिए। सुरक्षा का भी प्रबंध होना अनिवार्य है।

खदान के अगल-बगल अवैध खनन होता है तो इसके लिए लेसी की जवाबदेही निर्धारित की जाय। 

नियमित निरीक्षण होना चाहिए कि खदान की अनुज्ञप्ति शर्तों का पालन किया जा रहा है अथवा नहीं।

अवैध खनन में मौत होती है तो पुलिस खुद मुकदमा करती है तो चोरी की घटनाओं पर अंकुश लगता।

जिन खदानों में खनन कार्य संभव नहीं है, वहां युद्ध स्तर पर भराई का काम किया जाना चाहिए।

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