धनबाद, जेएनएन। बदनामी की पीड़ा कैसी होती है यह वासेपुर के वाशिंदे से अच्छी तरह कोई और बयां नहीं कर सकता। फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ प्रदर्शित होने के बाद देश-दुनिया में वासेपुर की कैसी इमेज बनी, बताने की जरूरत नहीं। इसका खामियाजा यहां के वाशिंदे को अब भी भुगतना पड़ रहा है। वे जब भी नए शहर में जाते हैं और ठहरने के लिए कमरे लेने होटल-गेस्ट हाउस में पहुंचते हैं तो नियमानुसार यहां के लोगों से भी आइडी की मांग की जाती है। आइडी पर अंकित वासेपुर को पढ़कर एकबारगी वहां के लोग चकित हो जाते हैं। उनके मन में सामने वाले के बारे में गैंग्स ऑफ वासेपुर से जुड़ी छवि बनती है।

इस छवि को मिटने में समय लगेगा। लेकिन अब वासेपुर के लोग अपनी छवि को लेकर बेहद सावधान हैं। इसी कारण इस बार जैसे ही वासेपुर में शूटिंग के लिए मुंबइयां टीम पहुंची तो लोग भड़क गए। जैसे साढ़ लाल कपड़े देखकर भड़कते हैं वैसे ही कैमरे को देखकर लोग भड़क गए। कहा, फिर आ गए वासेपुर को बदनाम करने। बहुत बना लिया सिनेमा। अब ये सब नहीं चलेगा। कैमरा बंद करो। हीरो सकते में रह गया। अपने ही घर में ऐसा विरोध। फिर सफाई दी, अबकी अच्छी इमेज वाली फिल्म बना रहे हैं। बहुत समझाने पर शूटिंग की इजाजत मिली। नई फिल्म से वासेपुर की कैसी इमेज बनेगी? प्रदर्शन का सबको इंतजार है।

कामरेड करेंगे गाय की राजनीति

अब तक तो गाय की राजनीति भाजपा ही करती रही है। इस राजनीति में अब निरसा के कामरेड भी कूद पड़े हैं। वह पशु तस्करों के हाथों भेंट चढ़ रही गायों की सुरक्षा में दुबले हुए जा रहे हैं। केंद्र और राज्य में भी सरकार होने के बावजूद गायों की सुरक्षा न होने के लिए वे भाजपा नेताओं पर हमलावर हैं। सवाल पूछ रहे हैं कि भाजपा सरकार में गायों की तस्करी क्यों नहीं रुक रही है? वह तस्करी के लिए भाजपा नेताओं और पुलिस के गठजोड़ को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके पास पूरा हिसाब-किताब है। कहते हैं-कोयले से ज्यादा गाय की तस्करी में कमाई है।

नीचे से ऊपर तक पैसा बंटता है। आरोप तो आरोप ही होता है। आरोप के तो कोई हाथ-पैर होते नहीं। सो, राजनीति करते हैं तो कामरेड भी आरोप लगा ही सकते हैं। गाय की राजनीति के फायदे-घाटे भी हैं। कामरेड भी जानते हैं। फायदे तो वही बता सकते हैं। इस राजनीति के घाटे भी हैं। ज्यादा करेंगे तो उनका परंपरागत वोट बैंक जरूर बिदकेगा।

और मुख्यमंत्री मुस्कुरा दिए

राजनीति में ऐसा ही होता है। इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आज जो साथ-साथ है कल भी साथ-साथ ही रहेगा और जो अलग-अलग है वो साथ-साथ नहीं होगा। एक समय रघुवर दास और अशोक मंडल के बहुत अच्छे संबंध थे। रघुवर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे तो अशोक धनबाद जिलाध्यक्ष। समय ने करवट ली। अशोक भाजपा को छोड़ पुराने घर झामुमो में लौट गए। इधर रघुवर झारखंड के मुख्यमंत्री बन गए।

निरसा में विधानसभा स्तरीय भाजपा के सम्मेलन में शिरकत करने मुख्यमंत्री पहुंचे तो मंडल भी राजनीति करने सड़क पर उतर गए। वह समर्थकों के साथ हाथ में झामुमो का झंडा लेकर मुगमा मोड़ पर खड़े हो गए। संयोग से जब मुख्यमंत्री का काफिला गुजर रहा था तो रघुवर और अशोक की नजरें मिली। गाड़ी के अंदर से ही अशोक को देख रघुवर मुस्कुराए। यह देख विरोध में खड़े अशोक भी मुस्कुरा दिए। और गाड़ी के अंदर से ही मुस्कुराते हुए रघुवर काफिले के साथ आगे बढ़ गए।

पुलिस का सायरन और चोर

धनबाद पुलिस का जवाब नहीं है। वह अपराध रोकने के लिए कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गई है। रात में सायरन बजाते हुए पेट्रोलिंग को निकल रही है। इसका फायदा कितना हो रहा पुलिस ही बता सकती है। हानि जगजाहिर हो जा रही है।

सायरन की आवाज सुन चोर सतर्क हो जाते हैं। इसका फायदा चोर उठा लेते हैं। आवाज सुन अंदाजा लगा लेते हैं कि पुलिस की पेट्रोलिंग गाड़ी उन लोगों से कितनी दूरी पर है। जब तक सायरन की आवाज नहीं सुनाई देती आराम से अपना काम कर रहे हैं।

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Posted By: Sachin Mishra