अशोक कुमार, धनबाद। महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना में आइआइटी आइएसएम (इंडियन स्कूल ऑफ माइंस) धनबाद को अहम जिम्मेदारी दी गई है। आइएसएम को झारखंड के 83 किलोमीटर क्षेत्र में बह रही गंगा की धार को निर्मल करना है। संस्थान के रसायन अभियंत्रण समेत पांच विभागों की टीम साहिबगंज में गंगा के किनारे बसे गांवों व कस्बों में सफाई व्यवस्था, स्वच्छ पानी की व्यवस्था और गंदे पानी को गंगा नदी में जाने से रोकने के लिए कार्ययोजना बनाकर काम कर रही है।

झारखंड में गंगा नदी 83 किलोमीटर लंबी है। उसे प्रदूषण मुक्त किया जा रहा है। राज्य में साहिबगंज और राजमहल के कुल 78 गांव गंगा नदी के किनारे बसे हैं। इन गांवों के करीब 15 नाले गंगा में गिरते हैं। एक साल पहले तक यहां मात्र 10 फीसदी लोग ही शौचालय का इस्तेमाल करते थे। अब इनकी संख्या बढ़ रही है। गंगा के किनारे नौ चाइना क्ले वाशरी हैं। इनसे निकलनेवाला प्रदूषित जल भी गंगा को प्रदूषित कर रहा है। अब शोधन करने के बाद ही इसे गंगा में छोड़ा जाएगा।

ऐसे होगी गंगा की धारा प्रदूषण मुक्त:

आइआइटी आइएसएम टीम के सदस्य प्रो. विनीत ने बताया कि साहिबगंज में गंगा के किनारे बसे गांवों को मॉडल गांव बनाने का काम कर रहे हैं। उन गांवों में नाली के पानी, जल प्रदूषण और ठोस कचरा अपशिष्ट प्रबंधन पर काम किया जा रहा है। ऐसे शौचालय बनाए जा रहे हैं जो पर्यावरण हितैषी हों। रसायन विभाग के समक्ष सबसे अधिक चुनौती इन गांवों के भूमिगत जल को प्रदूषणमुक्त करना है। यहां भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। जो मानव स्वास्थ्य के लिए काफी खतरनाक है। जमीन पर बहने वाले जल का शोधन कर यदि उसे नदी में छोड़ा जाएगा तो आर्सेनिक की मात्रा भूमिगत जल में कम होगी।

यह होगा उपाय:

- गांवों में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से पेयजल की आपूर्ति होगी। इसके लिए काम शुरू किया गया है।

- खेती में रसायनिक खाद का प्रयोग नहीं करने और जैविक खाद के प्रयोग को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।

- गंगा में गिरने वाले नालों के दूषित जल को लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट प्लांट में शोधित करने के बाद ही गंगा में छोड़ा जाएगा।

प्रोजेक्ट में शामिल हैं ये विभाग:

नमामि गंगे प्रोजेक्ट में रसायन अभियंत्रण, पर्यावरण अभियंत्रण, मानवीय और सामाजिक विज्ञान, सिविल अभियंत्रण, डिपार्टमेंट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के व्याख्याता लगे हैं।

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Posted By: Sachin Mishra

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