रिजवान शम्स धनबाद। जहां चाह-वहां राह। फटे टायरों से भी रोजगार की गाड़ी खींची जा सकती है। एक-दो लोग नहीं, धनबाद के कबाड़ी पट्टी इलाके में पूरी जमात है, जो फटे टायरों से रोजगार हासिल कर चुकी है। ये न सिर्फ फटे टायरों का सटीक प्रबंधन करते हैं बल्कि कई उपयोगी वस्तुएं भी बनाते हैं। इनके हुनर की खबर प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच चुकी है। झारखंड सरकार को इन्हें प्रोत्साहित करने और स्टार्टअप इंडिया जैसी योजनाओं से जोड़ने को कहा गया है। राज्य सरकार ने धनबाद नगर निगम को प्रोजेक्ट पेश करने का निर्देश दे दिया है।

सौ साल पुराना है कबाड़ी पट्टी का वजूद

वर्ष 1914 में यहां कबाड़ी पट्टी वजूद में आई थी। तब से लेकर आज तक न जाने कितने लोगों ने बिना किसी प्रशिक्षण के और बिना किसी बड़ी पूंजी के यहां स्वरोजगार हासिल किया। अब यहां पुरानी और टूटी-फूटी वस्तुओं को री-साइकिल करने का काम किया जाता है। इनमें टायर री-सोलिंग का काम सबसे ऊपर है। पुराने घिसे-पिटे टायरों की मरम्मत कर और उन पर रबर की नई परत चढ़ाकर नया रूप दे दिया जाता है।

गैर प्रशिक्षित सैकड़ों कामगार इसके जरिये अपने परिवार पाल रहे हैं। यहां 200 से अधिक टायर री-सोलिंग दुकानें काम कर रही हैं और डेढ़ दर्जन से अधिक गोदाम हैं, जहां फटे टायर व ट्यूब को री-सोल, री-साइकिल किया जाता है। इन अप्रशिक्षित कारीगरों के हुनर पर कई राज्यों की बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां भी निर्भर हैं।

250 हॉकर उठाते हैं टायर

कबाड़ी पट्टी में करीब ढाई सौ हॉकर हैं, जो घरों में जाकर पुराने और फटे टायरों की खरीदी करते हैं। इन्हें कबाड़ी पट्टी में बेचते हैं। यहां इन टायरों को काटकर इनके कई हिस्से अलग-अलग कर इस्तेमाल में लाए जाते हैं।

चल रही हजारों की जीविका

ढाई सौ हॉकर, दो सौ से अधिक कारखाने। यानी साढ़े चार सौ परिवार के हजारों लोग सीधे तौर पर कबाड़ी पट्टी के इस ‘लघु उद्योग’ से रोजगार पा रहे हैं। इनमें अधिकांश कारखानों की मासिक कमाई दस हजार रुपये महीने से अधिक है। जबकि कई दुकानें ऐसी भी हैं, जहां चार से पांच लोगों को रोजगार दिया गया है। कुछ बड़े गोदाम हैं, प्रत्येक में दर्जन भर तक कर्मी हैं।

कबाड़ी पट्टी के कारीगरों को प्रशिक्षित करने की तैयारी की जा रही है। इनका सर्वे होने के बाद हुनरमंद कारीगरों को आर्थिक रूप से मजबूत करने की दिशा में पहल की जाएगी।

-चंद्रशेखर अग्रवाल, मेयर धनबाद  

Posted By: Sanjay Pokhriyal