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धनबाद, जेएनएन। किसी भी विकसित समाज की संकल्पना बगैर शिक्षा के नहीं की जा सकती, पर आज शिक्षा सिर्फ संपन्न लोगों के वश की बात हो गई है। तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद निर्धन बच्चों का बेहतर शिक्षा हासिल करना महज एक सपना ही रह जाता है। ऐसे बच्चों के सपनों को नई उड़ान मिल सके, इसलिए भागा झरिया की रहने वाली सोनी सिन्हा ने अपनी तकलीफ दरकिनार कर बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। झरिया के शहीद हीरा झा संस्कारशाला में रोजाना पांच से छह घंटे तक आर्थिक रूप से कमजोर लगभग 100 बच्चों को निश्शुल्क शिक्षादान दे रही है। ऐसा करते हुए सोनी को चार साल हो गए हैं। अपना और अपने परिवार का बोझ उठाते हुए सोनी शिक्षादान नियमित कर रही है। पढ़ाने का उनका मकसद पैसा कमाना नही बल्कि गरीब बच्चों को ऐसी शिक्षा देना है, ताकि ये बच्चे भी हर क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।

घर का बोझ उठाते हुए निश्शुल्क शिक्षादान: सोनी के पिता विजय सिन्हा का देहांत 2002 में हो गया था। पिता की मौत के बाद घर की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। उस समय सोनी पाचवीं कक्षा में पढ़ती थी। सोनी की मा मधु सिन्हा ने बड़ी मुश्किल से घर संभालते हुए अपनी बेटी की पढ़ाई पूरी कराई। आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से सोनी ने प्राइवेट ट्यूशन करना शुरू कर दिया। अपना और घर का बोझ अपने कंधों पर ले लिया। इसी बीच, कोलफील्ड कॉलेज झरिया से अर्थशास्त्र में स्नातक भी उत्तीर्ण किया। सोनी ने बताया कि बचपन से ही मेरी इच्छा थी जिस परेशानी में मैंने शिक्षा हासिल की है, किसी और के साथ ऐसा न हो। गरीब बच्चों को निश्शुल्क शिक्षा देना सपना रहा है।

2015 में शुरू हुई शहीद हीरा झा संस्कारशाला: सोनी का कहना है कि आसपास के सुविधाविहीन बच्चों को काम करते या कचरा चुनते देखती थी तो मन विचलित हो जाता था। उसी समय मैंने ठान लिया कि ऐसे गरीब बच्चों को भी पढ़ने और आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए। बस फिर क्या था समाधान शिक्षादान की नई पाठशाला से जुड़ गई। पहले झरिया थाना मोड़ में एक घर की छत पर बच्चों को निश्शुल्क पढ़ाने जाती थी, फिर 2015 में शहीद हीरा झा संस्कारशाला की शुरुआत हुई। यहां आकर बच्चों को निश्शुल्क पढ़ाने लगी और आज भी कायम है। कोशिश यही रहेगी कि हमेशा जरूरतमंद बच्चों को निश्शुल्क पढ़ाती रहूं। सोनी के घर में मां और एक भाई है।

Posted By: Jagran

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