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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 26, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

गजलीटांड़ खान हादसा: आजतक पूरी नहीं हुई जांच की प्रक्रिया, शहीद स्तंभ पर हर साल बस औपचारिकता निभा रहे!

By Sudhir Kumar SinghEdited By: Deepak Kumar Pandey
Published: Mon, 26 Sep 2022 03:39 PM (IST)

26 सितंबर 1995... कतरास कोयलांचल के लोग शायद ही कभी इस दिन को भूल पाएं। इसी तारीख ने कतरास के ...और पढ़ें

गजलीटांड़ में खान हादसे के बाद बनाया गया शहीद स्‍तंभ।
गजलीटांड़ में खान हादसे के बाद बनाया गया शहीद स्‍तंभ।

सुधीर सुमन, कतरास (धनबाद): 26 सितंबर 1995... कतरास कोयलांचल के लोग शायद ही कभी इस दिन को भूल पाएं। इसी तारीख ने कतरास के 64 कोयला मजदूरों की जान ले ली थी। पूरे धनबाद कोयलांचल में 79 लोगों ने जल समाधि ले ली। हालांकि इतने लोगों की मौत की वजह आज भी 'एक्‍ट ऑफ गॉड' से अधिक कुछ भी नहीं है।

कतरास के लोगों की आंखें उस काले दिन को याद कर नम हो जाती हैं। जिन्‍होंने अपनों को खोया, वह बताते हैं कि उस दिन रिकाॅर्ड 331 मिलीमीटर बारिश हुई थी, जिसके कारण कतरी नदी में उफान आ गया था। इसके कारण गजलीटांड़ खदान के बगल में बहने वाली कतरी नदी की जलधारा बेकाबू हो गई और इसके दबाव को तटबंध झेल नहीं सका। तटबंध को तोड़ते हुए नदी की धारा मुड़कर गजलीटांड़ खदान की ओर चली गई, जिससे छह नंबर चानक में उस दिन द्वितीय पाली में काम कर रहे 64 श्रमिकों की जल समाधि हो ग‌ई थी। हालांकि सात नंबर चानक से कुछ श्रमिक अपनी सूझबूझ से किसी तरह जान बचाकर निकले थे।

इस घटना ने बहुत कुछ बदला। बीसीसीएल बीआइएफआर में चली गई थी, खनन का पैटर्न बदला और बीसीसीएल का स्वरूप बदला। मालूम हो कि इस घटना की उच्चस्तरीय जांच के लिए भारत सरकार के तत्कालीन कोयला मंत्री जगदीश टाइटलर ने कोर्ट ऑफ इंक्वायरी गठित की थी, ताकि सच्चाई सामने आ सके। सेवानिवृत्‍त जस्टिस के नेतृत्व में जांच शुरू हुई, लेकिन आजतक कोई नतीजा सामने नहीं आ सका। इस घटना के बाद अब श्रमिकों की याद में प्रत्येक वर्ष 26 सितंबर को श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया जाता है। जनप्रतिनिधियों के अलावा बीसीसीएल के बड़े पदाधिकारी आते हैं और घटना की जांच कर दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की बात कहते हैं, लेकिन ऐसा होता नहीं है। सारी घोषणाएं कागजों तक पहुंचकर दम तोड़ देती हैं और धरातल पर कोई कार्य नहीं होता है। श्रमिक एवं यूनियनों के प्रतिनिधि भी आते हैं तो शहीद स्तंभ पर माल्यार्पण कर मृतकों की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखकर चले जाते हैं।

जान गंवाने वाले 64 श्रमिकों के स्वजन भी आते हैं और रोते-पीटते हैं... बड़े पदाधिकारियों को अपना दुखड़ा सुनाते हैं... लेकिन सारे आश्‍वासन भी अब रटे-रटाए हैं। प्रथा की तरह ही आज ही के दिन के साथ अगले साल तक के लिए सबकु शांत हो जाता है। इस पूरे प्रकरण में एक बात उल्लेखनीय है कि इस हादसे से क्या सबक लिया गया, इस हादसे में क्‍या-क्‍या मानवीय भूल रेखांकित हुई थी, यह आज तक गिने-चुने अधिक‍ारियों के अलावा और किसी को मालूम नहीं!