जागरण संवाददाता, धनबाद। जिन इलाकों में कभी लाल आतंक सिर चढ़कर बोलता था अब गजराज का खौफ है। वे नक्सलियों से ज्यादा आतंक ढा रहे हैं। आए दिन किसी न किसी को कुचलकर मार रहे हैं। एक सप्ताह के अंदर तीन आदमी की जान ले चुके हैं। आलम यह है कि एक साल के अंदर धनबाद, बोकारो, गिरिडीह और जामताड़ा जिले में नक्सलियों से ज्यादा हाथियों के हमले में ग्रामीण-आदिवासियों की अकाल मौत हुई है।

झारखंड के धनबाद, बोकारो, गिरिडीह और जामताड़ा जिले का एक खास क्षेत्र लाल आतंक के रूप में कुख्यात है। यह इलाका जंगली क्षेत्र है और दामोदर नदी के दोनों तरफ पड़ता है। कभी यहां नक्सलियों का सिर चढ़कर बोलता था। आए दिन खून-खराबा और हत्याएं होती थी। लेकिन, इन क्षेत्रों में अब नक्सली ¨हसा की घटनाएं बहुत कम होती हैं। एक नए तरह की ¨हसा और हमले में वृद्धि हुई है। यह है हाथियों का हमला। धनबाद जिले के टुंडी के साथ के ग्रामीण क्षेत्रों में हाथियों के खौफ से लोगों की रात की नींद गायब हो गई है।

एक सप्ताह में तीन की मौत : गिरिडीह जिले के पीरटाड़ प्रखंड के सुगवाताड गांव में सोमवार तड़के जंगली हाथियों के झुंड ने हमला बोल दिया। घर में सो रहे 70 वर्षीय वृद्ध धनेश्वर राय को कुचलकर मार डाला। इससे पहले 25 अगस्त शनिवार की रात मुफ्फसिल थाना क्षेत्र के जसपुर पंचायत के कोल्हरिया गांव में 18 हाथियों के झुंड ने हमला किया। 65 वर्षीय गोपी कृष्ण को कुचलकर मार डाला। इससे पहले 22 अगस्त की रात धनबाद जिले के रेका सोरेन को कुचलकर मार डाला। रेका वन विभाग का प्रशिक्षित मशालची भी था।

साल भर में दो दर्जन से ज्यादा की गई जान : धनबाद, बोकारो, गिरिडीह और जामताड़ा जिले में एक साल के अंदर दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हाथियों के हमले में हो चुकी है। धनबाद जिले के टुंडी के दोमुंडा गांव में 20 और 21 जून 18 की रात हाथियों के झुंड ने हमले कर दो बच्चों को कुचल डाला। इलाज के दौरान दोनों की मौत हो गई। इससे पहले डोंगापानी, दुर्गारायडीह और दुम्मा में भी चार लोगों की मृत्यु हो गई थी। बोकारो जिले के लुगू और झुमरा पहाड़ की तलहटी के गांवों में आए दिन जंगली हाथियों का उत्पाद सामने आता रहता है। लुगू पहाड़ में दर्जनों की संख्या में जंगली हाथियों का बसेरा है। हाथियों का झुंड आस-पास के गांवों में भारी तबाही मचाता है। मार्च 18 में उपरघाट के मुंगोरंगामाटी में चरवाहा डेगलाल महतो को जंगली हाथियों ने कुचल कर मार डाला था। जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड के लोहारंगी में अप्रैल महीने में जियाउद्दीन अंसारी और जून महीने में बनजमुनिया के जीतू राणा की मौत हाथियों के हमले में हो गई। हाथी से टकराव के लिए मानव खुद जिम्मेवार : हाथियों के हमले के लिए मानव खुद जिम्मेवार है। जंगल में हाथी रहते हैं। तेजी से जंगल काटे जा रहे हैं। इससे हाथियों के विचरण का क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है। घटते विचरण क्षेत्र के कारण वह निकलकर आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं। भोजन की तलाश में रात में गांव-घर में धावा बोल रहे हैं इससे लोग कुचल कर मर रहे हैं। दुमका के मसानजोर होते हुए नाला, कुंडहित, नारायणपुर, टुंडी पीरटांड जंगल के जरिए बिहार का जमुई हाथियों के विचरण का कॉरीडोर है। हाथियों के झुंड को वन विभाग के अधिकारी अपने क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भगाते रहते हैं। हाथी जिस क्षेत्र से गुजरते हैं जानमाल की क्षति करते हैं।

चार लाख मुआवजा : हाथियों के हमले में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए वन विभाग ने मुआवजा का प्रावधान कर रखा है। पहले आश्रित को दो लाख मुआवजा मिलता था। इसे बढ़ाकर चार लाख कर दिया गया है। व्यस्क की मृत्यु होने पर चार लाख और 18 वर्ष से कम उम्र के लिए दो लाख मुआवजा दिया जाता है। -----------------------

धनबाद जिले के टुंडी में हाथियों के विचरण क्षेत्र वाले गांवों की सूची तैयार की गई है। इन गांवों में विद्युतापूर्ति के लिए बिजली विभाग से बात हुई है। पहाड़ की तलहटी के नीचे बसे वैसे गांवों में जहां विद्युतापूर्ति संभव नहीं है सोलर लाइट से प्रकाश की व्यवस्था की जाएगी। एक माह के अंदर गांवों में सोलर लाइट लग जाएगी। रात में प्रकाश की व्यवस्था होने से हाथी नहीं आएंगे।

सौरव चंद्रा, जिला वन पदाधिकारी, धनबाद।

Posted By: Jagran

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