साहिबंगज [ धनंजय मिश्र ]। साहिबगंज जिले में गंगा नदी की लंबाई 84 किमी है। गंगा का अधिकतर हिस्सा जिले के राजमहल अनुमंडल से होकर गुजरता है। साहिबगंज के राम सेवक यादव की मानें तो महज एक दशक पहले कभी गंगा के तट पर कछुए घूमते दिखते रहते थे। अब ऐसा नहीं है। पश्चिम बंगाल के तस्करों ने गंगा नदी के किनारे रहने वालों की मदद से कछुओं का इस कदर शिकार शुरू किया कि अब उनकी संख्या तुलनात्मक तौर पर बेहद कम हो चुकी है। एक साल पहले से गंगा में कछुआ को बचाने और बढ़ाने की मुहिम आकार लेने लगी है।

गंगा नदी में महीन जाल या मच्छरदानी डालने पर प्रतिबंध

राजमहल में अजीजुर रहमान को गंगा प्रहरी बनाया गया है। वे कछुआ के रहनुमा बन चुके हैं। गंगा के तटीय गांवों के लोगों को जागरुक कर बंगाल के कछुआ तस्करों के राजमहल प्रवेश पर उन्होंने सामाजिक प्रतिबंध लगा दिया है। बंगाल के कछुआ तस्करों को भय हो चुका है कि कछुआ लेने गये तो आम लोग पकड़वा देंगे। इसके अलावा गंगा नदी में मछली पकड़ने के नाम पर महीन जाल या मच्छरदानी डालने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। मकसद यही है कि महीन जाल के सहारे कछुआ का शिकार नहीं हो सके। रहमान ने गंगा प्रहरी बनने के पहले देहरादून के भारतीय वन्य जीव संस्थान में रह कर प्रशिक्षण लिया है। फिलवक्त साहिबगंज जिले में 50 लोग गंगा प्रहरी की जवाबदेही निभा रहे हैं।

वरागुर एवं चित्रा इंडिका प्रजाति के कछुआ हुए विलुप्त
गंगा में अभी 12 प्रजाति के कछुआ मिल रहे हैं। पचेड़ा, सुंदरी, कटहेवा, मोरपंखी, चौड़, धमोक, साल, इंडियन स्टार प्रजाति के कछुआ उपलब्ध है। वरागुर एवं चित्रा इंडिका प्रजाति के कछुआ विलुप्त हो चले हैं। सड़ी गली वनस्पति खाकर कछुआ गंगा को साफ करते हैं। कछुए तट के रेत पर घोंसला बना कर अंडे देते हैं। उसी दौरान आम लोग कछुआ को पकड़ लेते थे। चार से पांच सौ रुपये में उसे बंगाल के तस्करों को बेच दिया जाता था। अब अजीजुर रहमान जैसे गंगा प्रहरी लोगों को समझा रहे हैं कि कछुआ जैसे जीव रहेंगे तभी गंगा आम लोगों के लिए अधिक उपयोगी बनी रहेगी। डराया भी जा रहा है कि कछुआ की तस्करी में पकड़ा गये तो जिंदगी खराब हो जाएगी।

गंगा का बहाव क्षेत्र बदलने से भी कछुआ को नुकसान
गंगा नदी का बहाव क्षेत्र बदलता रहता है। किसी साल बारिश अधिक होने पर गंगा के बहाव का क्षेत्र बदल जाता है। कछुआ जहां घोंसला बनाये रहते हैं, वो जगह खेती लायक हो जाती है। किसान हल या ट्रैक्टर चला देते हैं तो अंडे नष्ट हो जाते हैं। इस मसले पर गंगा प्रहरी आम लोगों को जागरुक करने में लगे हैं।

साहिबगंज जिले में गंगा के भीतर 750 कछुआ

साहिबगंज के जिला वन प्रमंडल पदाधिकारी विकास पालीवाल के मुताबिक देहरादून के भारतीय वन्य जीव संस्थान की देखरेख में गंगा प्रहरियों के जरिए साल भर पहले कछुआ की गणना करायी गयी थी। 750 कछुआ मिले थे। महज पांच साल पहले गंगा में एक हजार कछुआ थे। कोशिश है कि गंगा में फिर सामान्य जन को सामान्य दिनों में पहले की तरह कछुआ दिखने लगे।


भारतीय वन्य जीव संस्थान के जरिये कछुआ को बचाने की कवायद शुरू की गयी है। नतीजे ठीक दिख रहे हैं। आम लोगों का बंगाल के तस्करों के साथ ताल्लुकात टूट रहे हैं। गंगा प्रहरियों ने बढिय़ा भूमिका निभायी है।
-डाक्टर रंजीत कुमार सिंह, पर्यावरणविद, साहिबगंज

Posted By: Mritunjay

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