धनबाद, जेएनएन। धनबाद कोयलाचल में मजदूरों के लिए हक मागने और प्रबंधन पर दबाव बनाकर श्रमिक-हित में सद्प्रयास करने का एक गौरवपूर्ण इतिहास है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सत्यमूर्ति, जोसेफ बैपटिस्टा, दीवान चमनलाल जैसे दिग्गज नेताओं ने यहा आकर श्रमिकों के लिए आवाज बुलंद की थी। आधुनिक भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. राधाकमल मुखर्जी ने अपनी कालजयी पुस्तक 'इंडियन वर्किंग क्लास' में झरिया कोयला क्षेत्र और जमशेदपुर के लौह अयस्क उत्पादक क्षेत्र पर विशद् प्रकाश डाला है। इसमें प्रो. अब्दुल बारी की चर्चा है जिन्होंने कोयला क्षेत्र में मजदूरों को न केवल एकजुट किया, बल्कि उनके लिए, अपने जीवन का एक लम्बा भाग झरिया-कोयलाचल को समर्पित कर दिया।

प्रो. अब्दुल बारी महात्मा गाधी, देशरत्‍‌न डॉ राजेन्द्र प्रसाद और महान न्यायविद् मजहरूल हक द्वारा सन् 1921 ई. में पटना में स्थापित प्रसिद्ध 'सदाकत आश्रम' से सम्बद्ध थे। बिहार (बिहार, बंगाल और ओड़ीसा से युक्त एक विशाल प्रात) में राजनीतिक चेतना फूंकने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। प्रो. बारी ने महात्मा गाधी की प्रेरणा से स्वाधीनता आदोलन में कदम रखा। बिहार में उन्होंने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के साथ मिलकर स्वतंत्रता आदोलन को पल्लवित किया।

भारत के कोयला उद्योग और श्रमिक राजनीति में भागीदारी निभाने के लिए सन् 1930 ई. के दशक के अंतिम चरण में, प्रो. अब्दुल बारी ने कोयलाचल में अपने ठोस कदम रखे थे। यहीं से वे टाटानगर स्थित लौह कारखाने के श्रमिक यूनियन की भी बागडोर संभालते थे। बारी साहब का सर्वाधिक सफल आयोजन मजदूरों की मागों को लेकर हुई वह हड़ताल थी जो मेसर्स बर्ड एंड कंपनी के खिलाफ उन्होंने किया था। उस कंपनी के तत्कालीन चेयरमैन सर एडवर्ड बेन्थल, द्वितीय विश्वयुद्ध के अवसर पर वायसराय की एक्ग्जक्यूटिव कमिटी के एक सदस्य भी मनोनीत हुए थे। मेसर्स बर्ड एंड कंपनी देश की चोटी की औद्योगिक संस्था थी, जिसकी सीधी पहुंच ब्रिटिश हुक्मरानों तक थी। प्रो. बारी ने अपने विचारोत्तेजक भाषणों से हड़ताल शुरू कर तो दी लेकिन कंपनी झुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। ईमामुल हई खान, शकरदयाल सिंह, दशरथ सिंह और शिवा रजवार जैसे स्थानीय नेता बारी साहब के सहयोग में लगे हुए थे। हड़ताल जब दो महीने खिंच गयी तो मजदूरों का उत्साह भी कम होने लगा था। इधर, प्रो. बारी के विरोधी यह प्रचार करने लगे थे कि बारी साहब ने गलत फैसला ले लिया। लेकिन इसे प्रो. बारी की दृढ़ता कहें कि ढाई महीने बाद अंतत: कंपनी को झुकना पड़ा। इस ऐतिहासिक हड़ताल से पूर्व भी कई ऐसे मौके हुए, जहा प्रो. बारी की मजदूरों के दुख-दर्द के प्रति समर्पण ने, न केवल श्रमिकों को निर्णायक विजय दिलायी, बल्कि बिहार प्रदेश में प्रो. को बारी को एक बड़े नेता के रूप में भी उभारा। यही कारण है कि सन् 1937 ई. के प्रातीय चुनाव में अब्दुल बारी चम्पारण से काग्रेस के टिकट पर विधायक चुने गये। उसी वर्ष वे बिहार विधानसभा के डिप्टी स्पीकर भी चुने गये थे।

मेसर्स टर्नर मॉरिशन कंपनी की लोदना कोलियरी में भी बारी साहब नियमित रूप से श्रम-संबंध का मुद्दा उठाते रहे। मेसर्स करनानी की भालगढ़ा कोलियरी में भी उनका सक्रिय संगठन था। वहीं, रानीगंज कोल एसोसियेशन के कुस्तौर क्षेत्र में भी उनका खासा दबदबा था।

जिन दिनों बारी साहब झरिया-कोयलाचल में मजदूार राजनीति कर रहे थे, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस भी मजदूरों की समस्या का हल करने अक्सर इस क्षेत्र में पधारते थे। नेताजी भी बारी साहब की प्रतिभा से परिचित हुए और यही कारण है कि जमशेदपुर लेबर एसोसियेशन के अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने प्रो. बारी को उस संघ का अध्यक्ष बनने का आग्रह किया। सुभाष बाबू के इस निवेदन को प्रो. बारी ने न केवल स्वीकार किया, बल्कि उस टाटा वर्कर्स यूनियन (पुराना नाम जमशेदपुर लेबर एसोसियेशन) के आजीवन अध्यक्ष बने रहे।

सन् 1946 ई. में प्रो. बारी बिहार प्रदेश काग्रेस कमिटी के अध्यक्ष बने। लेकिन उनकी प्रगति और पार्टी में ऊंचा कद कुछ लोगों को खटकता था। इसी कारण 28 मार्च 1947 ई. को कार से जमशेदपुर से पटना जाने के क्रम में फतुहा के पास अपराधियों ने गोली मार कर उनकी हत्या कर दी। प्रो. बारी के दोनों बेटे सलाउद्दीन और शहाबुद्दीन अनाथ हो गये। बारी साहब से जीवन भर सियासी प्रतिद्वंद्विता रखने वाले लोग उनके देहात के बाद ही जान सके कि उनके घर में चार-छह टूटी-फूटी कुर्सिया भी नहीं थी, जिस पर बैठकर मातमपुर्सी में आनेवाले हितैषी उन्हें श्रद्धाजलि दे पाते।

प्रस्तुति : बनखंडी मिश्र।

Posted By: Jagran

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