धनबाद [जागरण स्पेशल]।अध्यक्षजी के लिए तो जैसे लॉटरी लग गई है। उनकी दुकान तेजी पर है। ऐसा नहीं है कि पहले दुकान नहीं चल रही थी। कारोबार तो उनका अध्यक्ष बनने के साथ ही शुरू हो गया था। अपनी कमेटी में पदों का सौदा कितनों से किया होगा उन्हें भी याद नहीं होगा। मंच-मोर्चा का अलग से टेंडर।

चुनाव में सबका धंधा चल पड़ता है। अध्यक्षजी कुछ ज्यादा ही चला रहे हैं। अपने लिए टिकट का तो जुगाड़ ही नहीं है, दूसरे को दोनों हाथ से बांट रहे हैं। बदले में दाम भी वसूल रहे हैं। टिकट की जाल में फांसने का उनका संवाद अदायगी भी गजब का होता है-सर्वे में सबसे आगे आपका नाम चल रहा है। एक नहीं तीनों सर्वे में आपका ही नाम है। हम तो प्रभारी के सामने भी आपका ही नाम लिए हैं। रायशुमारी में भी आप ही का नाम लेंगे।

सयाने लोग तो अध्यक्षजी के नस नस से वाकिफ हैं। वे तो जाल में नहीं फंस रहे हैं। बेचारे गांव के सीधे-सादे लोग विश्वास कर ले रहे हैं। फीस दे रहे हैं और चुनावी तैयारी में भी लग गए हैं। अब कौन बताए, ऐसे लोगों को टिकट तो मिलना है नहीं। टिकट जिसे देना है उसका नाम तो पार्टी ने तय कर रखा है। अध्यक्षजी दुकानदारी के चक्कर में हर क्षेत्र में चार-पांच उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं। टिकट नहीं मिलेगा तो इन लोगों को मानसिक धक्का लगेगा। नाराज होंगे। इनकी नाराजगी से पार्टी को नुकसान होगा। इस नुकसान की भरपाई अध्यक्षजी कर पाएंगे, नहीं। जब खेत ही बाड़ खाने लगे तो क्या कहा जाय?

यह संस्कार ठीक नहींः यह पुलिस के एक साहब की बात है। विद्या मंदिर के संस्कार से संस्कारित हैं। साहब से संघ वालों को बड़ी उम्मीद थी। अच्छा करेंगे। संघ के लिए करेंगे। आखिर अपनों के लिए कौन नहीं करता? मौका भी आया। मिशनरीज को घेरने का इससे अच्छा मौका हो भी नहीं सकता। आखिर नाबालिग बच्ची की प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला हाथ लगा था। सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी। कार्रवाई हुई भी। लेकिन जैसी होनी चाहिए नहीं हुई। क्यों नहीं हुई? संघ वाले बताते हुए नहीं थक रहे हैं। जैसे ही कोई मिलता और दुखती रग पर हाथ रखता तो संघ वाले शुरू हो जाते हैं। अपना बच्चा लायक नहीं निकला। मैनेज हो गया। विद्या मंदिर के संस्कार को मिट्टी में मिला दिया।

कामरेड की प्रेशर पॉलीटिक्सः कामरेड परेशान हैं। राजनीतिक भविष्य का सवाल है। इसलिए परेशानी कुछ ज्यादा है। सूबे की अंतिम सीमा के कामरेड हैं। सब जानते हैं कि अबकी पांव उखड़ गए तो फिर कभी जम नहीं पाएंगे। इसलिए खूब गुलाटी मार रहे हैं। लोकसभा चुनाव में जब लाल पार्टियां महागठबंधन से तिरस्कृत कर दी गईं तो कामरेड ने अपनों को ही दगा दे दिया। उल्टी लाइन लेते हुए हाथ पकड़ कर लटक गए। किरकिटिया बाबा को अपने क्षेत्र में लाख वोट का बढ़त दिलाने का सब्जबाग दिखा दिया। नतीजा आया तो एक लाख से पीछे। कामरेड के जनाधार का भी भांडा फूट गया। यही चिंता खाए जा रही है। महागठबंधन में जगह मिल जाए तो अब की नैया पार लगे। महागठबंधन वाले भाव नहीं दे रहे हैं क्योंकि पहले से उनका कैंडिडेट तैयार है। अब कामरेड को सूझ नहीं रहा है तो महागठबंधन बनने से पहले ही प्रत्याशी के रूप में अपने नाम की घोषणा करवा दी है। यह प्रेशर पॉलीटिक्स है। क्या तीर-धनुष वाली पार्टी दबाव में आएगी। इंतजार कीजिए।

सबल के सब होत सहायः सोनू-मोनू और पुन्नू का दिल टूट गया है। जो कुछ हुआ उससे किसी का भी दिल टूट सकता है। विधायकजी और मोटा भाई पर कितना विश्वास करते थे। दोनों के लिए किसी से लडऩे-भिडऩे को तैयार। उस रात लड़ भी गए। विधायकजी से दुर्व्यवहार हुआ। मोटा भाई पर बेल्ट से प्रहार हुआ। इसके बाद सोनू-मोनू और पुन्नू ने ही मोर्चा संभाला। बात बिगड़ गई। एक ही पार्टी परंपरा के होने के बावजूद दोनों तरफ से प्राथमिकी हुई। सोनू-मोनू और पुन्नू पर प्राथमिकी दर्ज हो गई। यह क्या? प्राथमिकी से मोटा भाई का नाम गायब। उन्होंने खेल कर दिया। यह तो होना ही था। सबल को सब होत सहाय, निर्बल के ना कोए...।

Posted By: Mritunjay

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