यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 13, 2021 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
मन लागो मेरो यार फकीरी में... 40 लाख की नाैकरी छोड़ आइआइटीयन अविरल बने संन्यासी, इस राह पर और भी कई
Digambar Jain Monk अविरल ने वर्ष 2015 में आइटीआइ वाराणासी से कंप्यूटर साइंस में पढ़ाई पूरी की थी। पास करने ...और पढ़ें

दिलीप सिन्हा, गिरिडीह। पूरी दुनिया आज सांसारिक मोह-माया एवं ग्लैमर के चकाचौंध के पीछे भाग रही है वहीं हर तरह से परिपूर्ण कुछ युवा ऐसे भी हैं जो इन भौतिक सुखों को छोड़कर संन्यास के रास्ते पर निकल रहे हैं। यह सुनने बहुत आश्चर्यचकित करता है लेकिन सच है। ऐसे ही युवकों में मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के ब्रजपुर निवासी व हीरा व्यवसायी 46 वर्षीय ब्रजेश, दिल्ली के रहने वाले 27 वर्षीय आइआइटीयन अविरल, मध्य प्रदेश इंदौर के रहने वाले और सरकारी अधिकारी के पुत्र 19 वर्षीय स्वातम, बड़े किसान परिवार के भोपाल के 36 वर्षीय संजय एवं मध्य प्रदेश के ही भिंड के 25 वर्षीय स्नातक अंकुश शामिल हैं। यह पांचों युवक सांसारिक मोह-माया त्यागकर संन्यास ग्रहण कर दिग्बंर जैन सन्यासी बनने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।

रविवार को दीक्षा समारोह
पांचों को रविवार को यहां दुनिया के सबसे बड़े जैन तीर्थ स्थल श्री सम्मेद शिखरजी मधुबन में आयोजित जैनेश्वरी मुनि दीक्षा समारोह में जैन मुनि की दीक्षा दी जाएगी। यह दीक्षा उन्हें इनके गुरू प्रसिद्ध जैन संत आचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज देंगे। विशुद्ध सागरजी महाराज से प्रभावित होकर ही पांचों ने जैन मुनि बनकर मोक्ष प्राप्ति का रास्ता चुना है। सांसारिक जीवन त्यागकर साधु बनने के गवाह पांचों के स्वजन भी बनेंगे। सभी के स्वजन मधुबन पहुंच चुके हैं। दीक्षा देने के पूर्व इनके मांगलिक कार्य गोद भराई हो चुकी है।

मध्य प्रदेश के इंदाैर निवासी स्वात्तम
विशुद्ध सागरजी महाराज से मिलकर चुना संन्यास का मार्ग
अविरल ने वर्ष 2015 में आइटीआइ वाराणासी से कंप्यूटर साइंस में पढ़ाई पूरी की थी। पास करने के बाद वर्ष 2015 में ही उसने बंगलुरू में गोल्ड मेन एसएसीएचएस कंपनी में बंगलुरू में नौकरी ज्वाइन की। 40 लाख रुपये सालाना पैकेज थी। जीवन शानदार चल रहा था। न्यूयार्क समेत विदेशों का भी भ्रमण किया था। फुटबाल खेलना और बाइक चलाना उन्हें पसंद था। इसी दौरान वर्ष 2018 में बंगलुरू में आचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज का उन्होंने दर्शन किया। वहां आदित्य सागरजी महाराज का चातुर्मास चल रहा था। अविरल ने दैनिक जागरण को बताया कि विशुद्ध सागरजी महाराज का दर्शन करते ही उन्होंने तय कर लिया कि अब संसार की दौड़ में अपना जीवन खराब नहीं करना है। साधु बनना है। इस फैसले का पहले घर वालों ने विरोध किया। समझाने की कोशिश की कि घर पर रहकर ही साधु का जीवन जीओ। ब्रम्हचर्य का पालन करो।
जीवन का यही सही रास्ता
अविरल ने घर वालों को समझाया कि जीवन का सही रास्ता यही है जो वह चुन रहा है। इसके बाद घर वाले मान गए। दोस्तों ने भी साधु बनने के उसके फैसले का विरोध किया और समझाने की कोशिश की। अविरल उल्टे सभी को समझाने में सफल हो गया। इसके बाद उसने फरवरी 2019 में नौकरी से इस्तीफा दे दिया और विशुद्ध सागरजी महाराज के शिष्य बन गए। जैन मुनि बनने की सारी अहर्ता को पूरा करने में उसे करीब ढ़ाई साल लग गए।

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के हीरा कारोबारी ब्रजेश
करोड़ों के हीरे का कारोबार भी नहीं रोक सका साधु बनने का रास्ता
मध्य प्रदेश के पन्ना जिला अंतर्गत ब्रजपुर निवासी बालचंद्र जी जैन का हीरों का कारोबार है। वर्ष 90 से बालचंद्रजी का परिवार आचार्य विशुद्ध सागरजी महाराज के संपर्क में है। बालचंद्रजी के हीरे का कारोबार उनके साथ उनके पुत्र ब्रजेश संभाल रहे थे। विशुद्ध सागरजी महाराज के सानिध्य में रहने का असर ब्रजेश पर पड़ा। धन-दौलत का आकर्षण उसे साधु बनने से रोक नहीं सका। उसने ब्रम्हचर्य का पालन किया। विवाह नहीं किया। एक दिन उसने साधु बनने के अपने फैसले की जानकारी अपने घर वालों को दी। सभी ने उसके फैसले का सम्मान किया।
