जागरण संवाददाता, धनबाद: शहीद निर्मल महतो मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के सेमिनार हॉल में जिला यक्ष्मा विभाग की ओर से शनिवार को मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट (एमडीआर) टीबी को लेकर जागरूकता प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रूप से कॉलेज के प्राचार्य डॉ ज्योति रंजन मौजूद थे। प्रशिक्षक के रूप में मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ यूके ओझा ने संबोधित किया। कार्यक्रम की निगरानी जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ जफरुल्लाह खान ने किया। इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलित करके किया गया। संबोधित करते हुए डॉ यूके ओझा ने बताया कि सामान्य टीबी के मरीज को दवा नहीं छोड़नी चाहिए। दवा छोड़ने से शरीर में रेसिस्टेंट शुरू हो जाता है। इसके बाद दवा का प्रभाव भी शरीर पर नहीं होने लगता है। ऐसी स्थिति में मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट होने लगता है। इसका अर्थ यह हुआ कि शरीर पर कोई भी टीबी की दवा प्रभाव नहीं हो पाती है।

2 वर्ष तक खानी होती है एमडीआर टीबी की दवा

डॉ ओझा ने बताया कि सामान्य टीबी के मरीजों को 8 महीने तक दवा खानी पड़ती है। इसके बाद मरीज पूरी तरह से ठीक हो जाता है। लेकिन एमडीआर के मामले में ऐसा नहीं होता है। दवा का प्रभाव नहीं होने के कारण ऐसे मरीजों ऐसे मरीजों को 2 वर्ष तक लगातार विशेष दवाएं दी जाती हैं। इसके साथ ही इस प्रकार के मरीजों को लगातार निगरानी करना पड़ता है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से ऐसे मरीजों के लिए विशेष वार्ड सदर अस्पताल परिसर में स्थित है। जब तक यहां मरीज भर्ती होते हैं, ऐसे मरीजों को विभाग की ओर से भोजन दिया जाता है।

सबसे ज्यादा जानलेवा होता है एमडीआर टीबी

एमडीआर टीबी के मरीजों में मृत्यु की आशंका सबसे ज्यादा होती है। सबसे गंभीर बात यह है कि इसके संपर्क में आने वाले लोग सीधे टीबी से ग्रसित मरीज हो सकते हैं। इसलिए इस प्रकार के मरीजों को अपने चेहरे पर मास्क लगाने की अनिवार्यता होती है। ऐसे मरीजों को देख रेख करना बेहद जरूरी होता है। एमडीआर के कई केस एक्सडीआर टीबी में बदल जाते हैं। इसे एक्सट्रीम ड्रग रेसिस्टेंट कहते हैं। यह अत्यंत जानलेवा होता है।

Edited By: Atul Singh