धनबाद [बीके पांडेय]। झारखंड में बोकारो रेलवे स्टेशन जल संरक्षण के लिए किसी मिसाल के कम नहीं है। जल संकट से जूझते लोगों को यह स्टेशन करीब सात साल से राह दिखा रहा है। इस स्टेशन ने समय रहते पानी की किल्लत का समाधान ढूंढ हजारों यात्रियों को राहत पहुंचाई।

रेल अधिकारी और अन्य कर्मी बताते हैं कि 2008-09 में बोकारो रेलवे स्टेशन पर पानी की भारी किल्लत थी। धीरे-धीरे यह बात दक्षिण पूर्व रेलवे मुख्यालय पहुंची। तत्कालीन महाप्रबंधक एके वर्मा ने इसका समाधान तलाशा। उन्होंने जल संकट को ध्यान में रख योजना बनाई और धरातल पर भी उतारा। बोकारो स्टेशन में उन्होंने रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्रोजेक्ट स्थापित किया। सात साल से हजारों रेलयात्रियों को रेन वाटर हार्वेस्टिंग के जरिये पीने का पानी मिल रहा है। यहां वर्षा जल को एक कुएं में जमा किया जाता है और पास में ही स्थापित बोरिंग से साफ पानी निकाल लिया जाता है, फिल्टर की प्रक्रिया से गुजरने के बाद यह यात्रियों के पीने के काम आता है। वाटर हार्वेस्टिंग की सोच अचानक पैदा नहीं हुई थी। यहां कभी पानी की इतनी दिक्कत थी कि लोग बूंद-बूंद को तरस जाते थे। इसी बीच जल संरक्षण की दूरदर्शी सोच ने यहां तस्वीर बदल दी।

बालू और पत्थर से गुजरकर हर बूंद धरती के अंदर : जुलाई 2012 में जब बोकारो स्टेशन पर रेन वाटर हार्वेस्टिंग प्लांट का उद्घाटन हुआ था तो इसे पैसे की बर्बादी बताया गया। आज जल संरक्षण की यह पहल आसपास के लोगों समेत अन्य रेलवे स्टेशनों के लिए भी नजीर बनी है। बोकारो स्टेशन पर पानी की एक भी बूंद बेकार नहीं जाती। सिर्फ रेलवे स्टेशन ही नहीं बल्कि, रेलवे डीजल शेड, डिपो में भी बारिश का पानी सहेजा जाता है। पूरे शेड के पानी को एक स्थान पर लाकर पाइप लाइन के सहारे बड़े कूप में डाला जाता है। कूप में बालू और पत्थर भरा गया है, जो जल को प्राकृतिक तौर पर छानता (फिल्टर करना) है। पास में ही 400 फीट गहराई तक की बोरिंग की गई है। इसमें पांच हॉर्सपावर (एचपी) का मोटर लगा है, जो साफ जल को बाहर निकालता है। हर दिन आठ से 10 हजार यात्रियों को यहां से पानी उपलब्ध होता है।

वर्षा जल को संग्रह कर लेते हैं। इससे भूमिगत जल स्तर बेहतर होता है। डीप बोरिंग से पानी निकालकर पीने के काम में लाया जाता है। आज स्टेशन पर जरूरत का अधिकांश पानी इस डीप बोर से ही उपलब्ध होता है।

- अजय कुमार हलदर, स्टेशन अधीक्षक, बोकारो

Posted By: Mritunjay

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