धनबाद, जेएनएन। जेबीसीसीआइ - 11 के गठन का निर्देश कोयला मंत्रालय दे चुका है। अब इस पर कोल इंडिया कब पहल करती है यह समय के गर्त में है। कोरोना की दूसरी लहर को लेकर यूनियनों में भी खासा उत्साह नहीं। हालांकि अंदरूनी हलचल शुरू हो चुकी है। हालांकि एक बात लगभग तय है कि पिछली बार की तरह इस बार यूनियनों का कोई आम एजेंडा नहीं बनने जा रहा। कम से कम भारतीय मजदूर संघ ने ऐसा तय कर रखा है। भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध अखिल भारतीय खदान मजदूर संघ के अध्यक्ष नरेंद्र सिंह की मानें तो वे किसी कॉमन एजेंडे के पक्ष में नहीं हैं। पिछली बार इसकी कोशिश की गई थी जो सफल नहीं रही। हमने एनसीडब्ल्यूए-10 के लिए कॉमन चार्टर ऑफ डिमांड बनाया था। इसका ड्राफ्ट तैयार हुआ जिसमें सभी केंद्रीय यूनियनों ने हस्ताक्षर भी किया। जब समझौते का वक्त आया तो हिंद मजदूर सभा के साथियों ने उस एजेंडे को मानने से इन्कार कर दिया। परिणाम यह रहा कि प्रबंधन ने फिर से सभी से अलग-अलग बात की और सभी ने श्रेय लेने की होड़ में अलग-अलग बयान दिए।

इंटक के नहीं होने से भी असंतुलन

नरेंद्र सिंह की मानें तो जेबीसीसीआइ में पहले पांच यूनियनों के लोग बैठते थे। इससे विषम परिस्थितियों में भी यह होता था कि यूनियन आपस में किसी मुद्दे पर वोटिंग करते थे। किसी पक्ष में तीन-दो का बहुमत होने पर उस पर सहमति का प्रयास होता था। अब इंटक में विवाद है और इस बार भी जेबीसीसीआइ -11 में उसके प्रतिनिधि बैठेंगे या नहीं यह साफ नहीं। चार यूनियनों में असहमति होने पर दो-दो इधर-उधर हो गए तो अलग समस्या हो जाएगी।

संयुक्त मोर्चा में पहले ही अलग-थलग है संघ

बता दें कि केंद्रीय यूनियनों के संयुक्त मोर्चा में भामसं पहले ही अलग थलग है। कोयला क्षेत्र में पांच दिवसीय हड़ताल के समय से ही इंटक, सीटू, एटक व एचएमएस साथ हैं लेकिन मजदूरों के मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाकर भामसं अलग हो चुका है। संघ नेता संयुक्त मोर्चा को स्थायी भी नहीं मानते। 10 छोटी यूनियनों को लेकर उन्होंने अपना एक अलग मोर्चा खड़ा किया था। ऐसे में इस बार की बैठकों में प्रबंधन जहां एकजुट रहेगा वहीं मजदूर प्रतिनिधियों में बिखराव दिखने की आशंका है।