धनबाद, [आशीष सिंह]। इसे व्यवस्था की खामी कहें या अधिकारियों की अदूरदर्शिता, लोगों की सुविधा के लिए खरीदी गईं 48 सिटी बसें बिना चले ही सड़ गईं। 2010 में जेएनएनयूआरएम (जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन) से लगभग 14 करोड़ में 70 सिटी बसें खरीदी गईं। फिलहाल 18 बसें ही चालू हालत में है। इसमें भी पांच बसें महिला स्वयं सहायता समूह के जिम्मे है। शेष 48 बसें बरटांड़ बस स्टैंड में खड़ी हैं। इनमें जंग लग चुका है। पौधे तक उग आए हैं। बसों के कलपुर्जे बैटरी, सेल्फ, इंजन प्लेट, क्लच प्लेट, फिल्टर, टूल किट, जैक, गियर बॉक्स आदि चोरी हो चुके हैं।

सूत्र बताते हैं कि जिन एनजीओ को बस संचालन का जिम्मा मिला था, उनमें से कईयों ने इनकी मरम्मत के नाम पर कलपुर्जे गायब कर दिए। 20 से अधिक सिटी बसों के लगभग पांच करोड़ के कीमती कलपुर्जे गायब हो चुके हैं। सबसे अहम यह है कि इन बसों को अब कबाड़ में भी कोई नहीं खरीद रहा है। नगर निगम के पास भी इसे बेचने या नीलाम करने का अधिकार नहीं है। नगर का करोड़ों रुपये बर्बाद हो गया, लोगों को सुविधा की जगह असुविधा हुई सो अलग। इसे देखने वाला कोई नहीं है। फिलहाल चालू हालत की बसें भी लॉकडाउन की वजह से बंद पड़ी हैं।

कई बार चलाने का हुआ प्रयास : जेएनएनयूआरएम से तीन फेज में 70 सिटी बसें खरीदी गई। इससे पब्लिक ट्रांसपोर्ट विकसित होने की उम्मीद जगी थी, लेकिन उम्मीदों पर पानी फिर गया। बसों के परिचालन की जिम्मेवारी निगम ने भूतपूर्व सैनिक संघ को सौंपी। दो माह में ही संघ ने हाथ खड़े कर दिए। निगम ने नई व्यवस्था के तहत सिटी बसों का संचालन जेटीडीसी को सौंपा। राइडर ने बसों को चालक उपलब्ध कराने का जिम्मा लिया। कुछ ही दिनों में यह व्यवस्था भी हवा हो गई। चालकों ने बकाया वेतन की मांग पर 20 बार हड़ताल की। स्थिति बद से बदतर होती गई। एक-एक कर सिटी बसें स्मारक में तब्दील होती गईं।

2015 में जेटीडीसी के हाथ खिंचने के बाद यह सेवा निगम को दे दी गई। शुरू में नगर निगम ने एनजीओ से बसों को चलवाया। एनजीओ का प्रयोग भी फेल रहा। फिर 2016 में आउटसोर्सिंग से बस संचालन का फैसला लिया गया। तीन एनजीओ को 10 बस सौंपी गई। किसी बस से 100 तो किसी बस से 45 तो किसी बस से 170 रुपया प्रति दिन का किराया आता था। इससे जिससे न तो मेंटेनेंस का खर्च निकलता था, न ही ड्राइवर, खलासी और कंडक्टर का खर्च। फिलहाल निगम 13 बसें चला रहा है। इसमें भी आए दिन बस खराब ही रहती है। पांच बसें महिला स्वयं सहायता समूह को चलाने के लिए दी गई हैं। बाकि बसें बरटांड़ बस डिपो परिसर में खड़ी खड़ी सड़ चुकी हैं।

डीलक्स बसें लाने की योजना ठंडे बस्ते में : सूत्र बताते हैं कि तत्कालीन मेयर और नगर आयुक्त के बीच हुए विवाद के बाद सिटी बसों को तत्काल प्रभाव से बरटांड़ बस डिपो परिसर में खड़ी करने का निर्देश जारी किया गया। जिस हालत में बसें थीं, उसी हालत में जहां-तहां आड़े-तिरछे बसें खड़ी कर दी गईं। अधिकतर बसों की बैटरी चोरी हो चुकी है। कलपुर्जे या तो सड़ चुके हैं या गायब हो गए। नगर निगम को भी सब मालूम है। जेएनएनयूआरएम से नगर निगम में 100 सिटी बसें खरीदी जानी थी। 70 सिटी बसों की हालत खस्ता हो चुकी है, इसलिए 30 डीलक्स बसों की खरीदारी भी ठंडे बस्ते में चली गई।

सिटी बसों का नए सिरे से आकलन किया जाएगा। कितनी बसें मरम्मत व चलने लायक हैं। कितनी बसें बिलकुल खराब हैं, उसका मूल्यांकन होगा। कुछ बसें चालू हालत में हैं। फिलहाल लॉकडाउन की वजह से बंद हैं। -चंद्रमोहन कश्यप, नगर प्रशासक, धनबाद।

Posted By: Sagar Singh

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस