धनबाद, [आशीष सिंह]। शहरी क्षेत्र में कोरोना से जंग को लेकर हर कोई तैयार है। जिला प्रशासन से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक मुस्तैद है। जरा सी सूचना पर पूरा प्रशासनिक अमला सजग हो जाता है। लेकिन, मुख्यालय से कुछ किमी की दूरी पर स्थित गांवों की तस्वीर इससे बिल्कुल जुदा है। समाचार और टीवी पर जानकारी मिलने के बाद से गांव वाले खुद एहतियात बरत रहे हैं। दूर-दूर तक सन्नाटा पसरा हुआ है। इक्का-दुक्का लोग ही अपने घर से बाहर नजर आते हैं। इनके पास कोरोना वायरस से बचने के लिए न तो संसाधन है और न जरूरी जानकारी। यही कारण है कि ये लोग मिट्टी और राख से अपने हाथ सैनिटाइज कर रहे हैं।

कुछ लोग जरूर हैं जो मिट्टी से हाथ धोने के बाद साबुन का प्रयोग करते हैं। मास्क के नाम पर इनके पास कुछ भी नहीं है। गांव की यह तस्वीर मुख्यालय से महज 12 किमी दूर करमाटांड़ गांव की है। यहां की आबादी घनी है, 750 लोगों का परिवार है। कोई दिहाड़ी मजदूर है, कोई राजमिस्त्री का काम करता है तो कोई ड्राइवर है। इन्हें कोरोना के बारे में जानकारी तो है, लेकिन इससे बचाव के उपाय नहीं मालूम। ग्रामीणों का कहना है कि एक माह से सभी अपने-अपने घरों में रह रहे हैं, लेकिन इतने दिनों में न तो जिला प्रशासन और न ही स्वास्थ्य विभाग की ओर से वायरस को लेकर कोई मुनादी कराई गई। जैसे-तैसे भरण-पोषण हो रहा है।

एक माह से न तो काम न राशन : दैनिक जागरण की टीम को देखते ही ग्रामीण इकट्ठा हो गए। सभी एक साथ कहने लगे कि साहब, हम लोगों दिहाड़ी मजदूर हैं। हीरालाल किस्कू, राजू रवानी, राजेश रवानी और रविलाल बेसरा ने कहा रोज कुआं खोदना होता है और रोज पानी पीते हैं। एक माह हो गया घर पर बैठे हुए। कोई काम नहीं मिल रहा है। राशन भी नहीं मिल रहा है। बचा-खुचा सामान है, कभी भी खत्म हो सकता है। खुद तो भूखे रह सकते हैं, लेकिन बच्चों को भूखा कैसे रखें। करमाटांड़ मोड़ पर सामान लेने जाते हैं तो वहां भी भगा दिया जा रहा है।

  • हीरापुर में दिहाड़ी मजदूरी करने जाते हैं। एक माह हो गए घर में बैठे हुए। कोई काम ही नहीं है। मुखिया जामबहादुर महतो से भी कुछ हल निकालने के लिए कहा, लेकिन कोई सुनवाई ही नहीं होती है। भारत बंद कर दिया, बहुत बढिय़ा। लेकिन गरीब मजदूरों का क्या, पेट कैसे भरेगा? - हीरालाल किस्कू, ग्रामीण करमाटांड़
  • मिट्टी ही हमारा सैनिटाइजर है। खाने को राशन मिल नहीं रहा है, हम लोगों सैनिटाइजर और मास्क कहां से खरीदेंगे। परिवार में पांच सदस्य हैं। 50 रुपये का मास्क बिक रहा है। इतने में एक दिन का राशन हो जाएगा। शहर पर तो सभी का ध्यान है, लेकिन गांव की सुध लेने वाला कोई नहीं है। - राजू रवानी, ग्रामीण करमाटांड़

  • बैंक मोड़ में एक साहब की गाड़ी चलाता हूं। एक महीना हो गया काम पर गए हुए। दो-तीन बार मालिक ने फोन कर वेतन ले जाने को कहा। घर से चौराहे तक निकलते हैं, तो मारकर भगा दिया जा रहा है। अपना वेतन भी नहीं ले पा रहे हैं, घर कैसे चलेगा कुछ समझ नहीं आ रहा। - राजेश रवानी, ग्रामीण करमाटांड़
  • राजमिस्त्री का काम करता हूं। हर जगह काम बंद है। एक महीने हो गए, ऐसा कब तक चलेगा। हमारे पास तो इतने पैसे भी नहीं हैं कि चीजें खरीदकर अपने घरों में रख सकें। रोज जितना कमाते हैं, उतना ही खाते हैं। न काम है, न पैसा और न राशन। ऐसे में हम करें भी तो क्या करें? - रविलाल बेसरा, ग्रामीण करमाटांड़
  • गांव में सैनिटाइजर की उपलब्धता कम है या नहीं है। ऐसे में लोग साबुन का उपयोग कर सकते हैं। नीम के पत्ते किसी बड़े बर्तन में उबाल लें। जब पानी आधा बचे तो उन पत्तों को रगड़ कर पानी को छान लें। उस पानी में फिटकरी और कपूर मिलाकर उससे हाथ साफ करें। -डॉ. डीबी सिंह, पर्यावरण वैज्ञानिक, केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान

Posted By: Sagar Singh

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