धनबाद [ मृत्युंजय पाठक ]। 17 साल बाद झारखंड भाजपा की राजनीति घूमकर उसी स्थान पर पहुंच गई जहां वर्ष 2003 में थी। बाबूलाल मरांडी मुख्यमंत्री थे। झारखंड भाजपा के चेहरा और नीति-नियंता थे। 2006 में भाजपा छोड़ने के करीब 14 साल बाद सोमवार को मरांडी की घर वापसी हुई। वे रांची में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और देश के गृहमंत्री अमित शाह की उपस्थिति में भाजपा में शामिल हो गए। इस माैके पर भाजपा (जनसंघ) के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं. दीनदयाल उपाध्याय और भारत माता की तस्वीर के सामने कतार में खड़े होकर जब भाजपाई श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे थे तो अपने आप सब कुछ साफ हो गया। स्वभाविक रूप से सबसे आगे गृह मंत्री अमित शाह थे। उनके पीछे बाबूलाल मरांडी, फिर केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा और सबसे अंत में रघुवर दास। यह तस्वीर बोल रही है-अब बाबूलाल झारखंड भाजपा के चेहरा हैं। उन्हीं के नेतृत्व में झारखंड में भाजपा झामुमो गठबंधन और उसके नेता मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से दो-दो हाथ करेगी। 

अर्जुन के सारथी बनने के बाद नेपथ्य में चले गए बाबूलाल मरांडी 

15 नवंबर, 2000 को झारखंड राज्य का सृजन होने के बाद झारखंड में भाजपा की सरकार बनी। बाबूलाल मरांडी प्रथम मुख्यमंत्री बने। लेकिन, उनके खिलाफ जदयू (समता पार्टी) के विधायकों ने बगावत किया। झारखंड में सरकार बचाने के लिए भाजपा को अपने सबसे बड़े आदिवासी नेता बाबूलाल मरांडी को मजबूरी में मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटानी पड़ी। और झामुमो से तीन साल पहले भाजपा में आए अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री की कुर्सी साैंप दी गई। इसी के साथ झारखंड भाजपा की राजनीति का चेहरा अर्जुन मुंडा बन गए। बाबूलाल नेपथ्य में चले गए। अपने को उपेक्षित महसूस करने के कारण मरांडी ने 2006 में भाजपा छोड़ झारखंड विकास मोर्चा (प्रो) नाम से अलग पार्टी बना ली। 14 साल तक संर्घष के बाद भी जब झारखंड की सत्ता तक नहीं पहुंचे तो सोमवार को पुराने घर में लाैट गए। झारखंड विधानसभा चुनाव- 2019 में भाजपा और भाजपाई मुख्यमंत्री रघुवर दास की हार के बाद पार्टी को एक नेतृत्वकर्ता और संगठनकर्ता की आवश्यकता थी। अब इस आवश्यकता को बाबूलाल मरांडी पूरा करेंगे। 

झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन को उन्हीं के होम ग्राउंड दुमका में दे चुके हैं पटकनी 

एक स्कूल शिक्षक से आरएसएस की शाखा और फिर राज्य में भाजपा की राजनीति का चेहरा बन झारखंड का प्रथम मुख्यमंत्री बनने वाले बाबूलाल मरांडी झारखंड मुक्ति मोर्चा की राजनीति की रग-रग को जानते हैं। झामुमो के अध्यक्ष शिबू सोरेन को उन्हीं के होम ग्राउंड दुमका लोकसभा क्षेत्र में पटकनी देने का भी अनुभव है। भाजपा ने पहली बार शिबू सोरेन के खिलाफ 1991 के लोकसभा चुनाव में दुमका से बाबूलाल मरांडी को खड़ा किया। मरांडी चुनाव हार गए लेकिन मनोबल का हाई रखा। 1996 के लोकसभा चुनाव में फिर शिबू सोरेन को चुनाैती दी। फिर हार मिली। लेकिन, बाबूलाल ने हार नहीं माना। 1998 के लोकसभा चुनाव में दुमका के अखाड़े में बाबूलाल ने शिबू सोरेन को पटकनी देकर देश की राजनीति में छा गए। केंद्र में वाजपेयी सरकार में मंत्री बने। 1999 के लोकसभा चुनाव में शिबू सोरेन ने खुद न चुनाव लड़ अपनी पत्नी रूपी सोरेन को लड़ाया। बाबूलाल ने शिबू सोरेन की पत्नी को भी पराजित किया। 

अब शिबू सोरेन के पुत्र मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से होगी लड़ाई 

झारखंड में झामुमो गठबंधन की सरकार है। पूर्ण बहुमत की सरकार है। हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री हैं। हेमंत सोरेन के सामने भाजपा को विपक्ष की राजनीति करनी है। भाजपा के चेहरा होंगे बाबूलाल मरांडी। यानी पांच साल तक झारखंड की राजनीति का झकझूमर हेमंत सोरेन और बाबूलाल के बीच ही है। बहुत जल्द ही दोनों दुमका विधानसभा क्षेत्र में आमने-सामने होंगे। दुमका विधानसभा का उपचुनाव होना है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के इस्तीफा देने के कारण दुमका में उपचुनाव की नाैबत आन पड़ी है। ऐसे में दुमका में हेमंत की प्रतिष्ठा दांव पर है। दुमका उपचुनाव बाबूलाल के लिए एक अवसर है। खुद को साबित करने का अवसर। क्योंकि दुमका बाबूलाल की भी कार्यस्थली रही है। वे पहली बार शिबू सोरेन को शिकस्त देकर दुमका से ही लोकसभा पहुंचे थे। दुमका में झामुमो और भाजपा प्रत्याशी की हार-जीत से भी झारखंड की राजनीति में बहुत कुछ तय होगा। 

Posted By: Mritunjay

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