धनबाद [ बनखंडी मिश्र ]। भारतीय फुटबॉल जगत में मेवालाल एक महान शख्सियत थे। यूं तो उन्होंने भारत को कई मैचों में जीत दिलाई थी। लेकिन, 1951 के एशियन गेम में उन्हें फुटबॉल जगत में काफी लोकप्रियता मिली। उस गेम में ईरान के खिलाफ उन्होंने जब विजयी गोल दाग कर हिंदुस्तान को गोल्ड मेडल दिलाया था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनकी पीठ थपथपाई थी। उनकी प्रशंसा में उन्होंने कहा था कि इस अद्धितीय खिलाड़ी को देश कभी नहीं भूलेगा। कारण, उस समय भारत ने हाल ही में आजाद हुआ था। खेल के लिए न पैसे थे, न संसाधन। फिर भी खिलाडिय़ों में खेलने का जोश और जच्बा ऐसा दिखाया कि दूसरे देश अचंभित रह गए थे।

दो ओलंपिकों में किया था भारत का प्रतिनिधित्व

मेवालाल की प्रतिभा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे दो-दो बार लंदन (1948) और हेलसिंकी (1952) ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल टीम का हिस्सा रहे। प्रथम श्रेणी के मैचों में इस खिलाड़ी ने प्रतिष्ठित मोहन बगान टीम के खिलाफ हैट्रिक लगाकर सबको चकित कर दिया था। कोयलांचल का सौभाग्य रहा था कि मेवालाल न केवल यहां आए थे, बल्कि उस समय के फुटबॉल खिलाडिय़ों को खेल के विशिष्ट गुर भी बता गए थे।

बिहार के हिसुआ में हुआ था जन्म

मेवालाल का जन्म एक जुलाई 1926 को दौलतपुर गांव में हुआ था. घर की माली हालत अत्यंत जर्जर थी। इसलिए पिता महादेव हरिजन अपनी पत्नी और बच्चे को लेकर कोलकाता चले गए। वहां फोर्ट विलियम में बगान की देखरेख करने का काम उन्हें मिल गया. वहां के हेस्टिंग्स ग्राउंड में अंग्रेजी सेना के अफसर फुटबॉल खेला करते थे। किशोर होने पर मेवालाल भी अपने पिता के साथ हेस्टिंग्स जाने लगे। एक दिन संयोग ऐसा रहा कि ग्राउंड के बाहर गयी गेंद पर मेवालाल ने अपना पैर जमाया। सधे हुए किक ने ग्राउंड पर मौजूद अंग्रेज अफसरों को चौंका दिया। उन्होंने उस किशोर (मेवालाल) को बॉल ब्वॉय की जिम्मेदारी दे दी।

बाइस्किल शॉट में हासिल थी महारत

फोर्ट विलियम एरिया में बने रेलवे के एक बंगले में रहने वाले एक साहब मि. बर्नेट ने मेवालाल में अच्छे खिलाड़ी होने का गुण देखकर अपने एक मित्र से कहकर 'मॉर्निंग स्टार' नामक क्लब में प्रशिक्षण के लिए भोजन-कपड़ा और दस रुपये मासिक जेब खर्च की प्रोत्साहन राशि की व्यवस्था कर दी। प्रशिक्षक ने मेवालाल को खेल के तौर-तरीकों से परिचित कराना शुरू कर दिया। मेहनत और समर्पण से मेवालाल बाइस्किल शॉट में महारथ हासिल कर ली। इस शॉट का खास गुण यह होता है कि ऊपर हवा में छलांग लगाते हुए दोनों ही पैरों से आकस्मिक शॉट लगाया जाता है। प्रतिपक्षी टीम के खिलाड़ी भौंचक होकर बचाव करने में फेल हो जाते थे। कुछ ही दिनों में वे कोलकाता के अंग्रेजी, हिंदी और बांग्ला अखबारों में छा गए।

1945 में लगाई थी पहली हैट्रिक

दोनों पैरों से फुटबॉल पर समान नियंत्रण मेवालाल का असाधारण कौशल था। 1945 में उन्होंने फस्र्ट डिविजन क्लब आर्यन्स से जुड़े और मोहन बगान जैसी सशक्त टीम के खिलाफ हैट्रिक लगाई। क्लब कॅरियर के दौरान उन्होंने 150 गोल दागे, जबकि संतोष ट्रॉफी में बंगाल की ओर से 39 गोल किए। कोलकाता फुटबॉल लीग में चार मौकों पर वह सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी थे। प्रतिष्ठित बीएनआर क्लब से भी वह संबद्ध रहे। अपने फुटबॉल कैरियर के दौरान वह कई यूरोपीय देशों में गए। 1951 के एशियन गेम्स के सभी मैच में उन्होंने गोल दागे थे। 

झरिया राजपरिवार ने किया था आमंत्रित

मेवालाल की शोहरत से झरिया राजपरिवार के कुंवर साहब ने झरिया के राज मैदान में क्षेत्रीय टीमों को ट्रेनिंग देने का आग्रह किया था। इसपर मेवालाल ने यहां आकर टीमों को प्रशिक्षण दिया था। उनदिनों राज ग्राउंड इतना विस्तृत था, जहां मेला, तमाशा, सर्कस, बड़ी सभाएं आदि होती थीं। कभी-कभार तो छोटे हवाई जहाज भी उतरते थे। उस बार मेवालाल ने कोयलांचल के जिन खिलाडिय़ों को ट्रेनिंग दी थी वे थे- कालाचंद धीवर, निजामुद्दीन, हातिम अली व सिराज। मेवालाल से फुटबॉल के गुर सीखने के बाद इन चारों खिलाडिय़ों ने भी अपनी प्रतिभा की चमक बिखेरी थी। कोयलांचल के इन चारों खिलाडिय़ों की धमक क्षेत्रीय प्रतियोगिताओं में खूब थी।

1985 में भी आए थे

मेवालाल एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए 1985 में भी धनबाद पधारे थे। खेल से जुड़े उस कार्यक्रम में शिरकत करने यहां पहुंचे मेवालाल ने खिलाडिय़ों में जमकर जोश भरा था और मैदान में सर्वोत्तम प्रदर्शन दिखाने व टीम को जीत दिलाने की तकनीक बताई थी। मेवालाल का राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में उनके नाम 1032 गोल हैं। स्थानीय टूर्नामेंट में उनके 32 हैट्रिक का रिकॉर्ड आज तक बना हुआ है। 

Posted By: Mritunjay

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