मोहनपुर (देवघर) : सावन महीने के सात दिन बीत चुके हैं लेकिन इस साल कांवरिया पथ दुम्मा पर इस सन्नाटा है। सावन के महीने में दुम्मा से लेकर खिजुरिया तक ऐसा सन्नाटा लोग पहली बार देख रहे हैं। पिछले साल तक सावन में यह रास्ता गेरुआ वस्त्रधारी से पटा रहता था। उदयपुरा के निकट एक पेड़ के नीचे बैठे कुछ लोग आपस में बातचीत करने में व्यस्त थे। उनके बातचीत को बीच में रोकते हुए जब यह पूछा कि इस बार सावन में श्रावणी मेला नहीं लगा है तो यहां के स्थानीय लोग क्या कर रहे हैं? इसपर जवाब में भोला यादव ने कहा कि वह किसान हैं। बैंक से ऋण लेकर दो एकड़ भू-भाग में गरमा मकई की खेती की है। उम्मीद थी कि प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी श्रावणी मेले में मकई बेचकर अच्छी आमदनी होगी लेकिन अब मकई को बाजार में ले जाकर बेचना पड़ रहा है। इसकी वजह से वाहन किराया भी लगा रहा है और उस अनुपात में मुनाफा भी नहीं हो रहा है। तुलसी यादव ने कहा कि वह पिछले से तीन साल से श्रावणी मेले के दौरान फल और चाय की दुकान लगाकर अच्छी कमाई करते थे लेकिन कोरोना ने सबकुछ खत्म कर दिया है। उदयपुरा के ही भादो यादव ने कहा कि उनके पास दस दुधारू गाय है। सावन में दूध की खूब खपत होती थी और आमदनी भी अच्छी हो जाती थी। अभी देवघर ले जाकर दूध खपत करनी पड़ रही है।

बारा गांव के निवासी मुन्ना मंडल कहते हैं कि उनके पूर्वज ही कांवरिया पथ पर दुकान लगाते थे। अब वह मेला में दुकान लगा रहे थे लेकिन इस बार परेशानी में हैं। कारू साह ने कहा कि श्रावणी मेला नहीं लगने से चौतरफा मारी पड़ी है। आर्थिक संकट के अलावा प्रत्येक साल श्रावणी मेले के बहाने कांवरिया पथ की हालत दुरुस्त हो जाती थी। इस बार न तो चापाकल दुरुस्त किया गया है और नहीं पथ। न बिजली और नहीं इस पथ के अन्य संसाधन। कोरोना ने पूरी तरह से तबाही किया है जिससे सहज उबरना भी संभव नहीं लग रहा है।

Posted By: Jagran

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