कांवरिया पथ से प्रदीप सिंह। रात के 10.30 बजे है। झारखंड व बिहार की सीमा पर स्थित दुम्मा गेट दुधिया रोशनी से नहा रहा है। अमूमन सुनसान रहने वाला यह इलाका कांवर की रुनझुन व भक्तों से इस कदर गुलजार है कि समय का पता ही नहीं चल रहा है। या यूं कहें यहां दिन व रात का अंतर पूरी तरह से मिट गया है। जहां तक नजर जा रही है, कांवरियां ही नजर आ रहे हैं, ऐसा लग रहा है मानो कांवरियां पथ में गेरुआ रंग की लंबी लकीर खींच दी गई हो।

गेट के समीप प्रशासनिक शिविर में कलाकार भक्ति गीतों की एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दे रहे हैं। मंच के सामने सैकड़ों कांवरियां इस कदर इन भजनों पर झूम रहे हैं, मानो इन्होंने 95 किमी की लंबी यात्रा ही नहीं की हो। शिवभक्तों का भी यह मानना है दुम्मा प्रवेश करते ही उन्हें एक नई ऊर्जा मिल जाती है। क्योंकि भक्तों को यह एहसास हो जाता है कि पिछले दो से तीन दिनों की यात्रा अब मंजिल के करीब पहुंच गई है, तभी तो दुम्मा प्रवेश द्वारा में घुसते ही भक्तों के बोल भी बदल जा रहे थे।

जी हां सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का जल भरकर कांवरिया बाबाधाम की ओर कूच करते हैं तो वे बोल बम..., बाबा नगरिया दूर है, जाना जरूर है..., बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा... व बाबा पार लगाएंगे... जैसे जयकारे 95 किमी शिलजोरी तक पहुंचने के दौरान लगाते हैं, लेकिन दुम्मा प्रवेश द्वार देखते ही इन भक्तों की बांछें खिल जाती हैं और मुंह से अपने आप ही निकलने लगता है- बोल बम, आ गए हम... । यह सोचकर उनमें नई ऊर्जा का संचार हो जाता है कि अब बाबा दरबार के बिल्कुल नजदीक पहुंच चुके हैं।

यहां मऊ से पहुंचे अनिल बम ने कहा कि पिछले दस साल से बाबा दरबार में हाजिरी लगा रहे हैं। दुम्मा पहुंचने के बाद काफी राहत मिलती है कि अब सफर अपने अंतिम पड़ाव तक पहुंच चुका है। वहीं बेतिया से आए किशोरी लाल के पैरों के जख्म उन्हें आगे चलने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब 90 प्रतिशत कष्ट दूर हो चुका है। भोजन के बाद कुछ देर आराम करेंगे और फिर बाबा दरबार के लिए कूच कर जाएंगे।

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Posted By: Alok Shahi

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