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5 साल बाद जगी आस; दुर्गा पूजा के बाद देवघर में शुरू होगा रेशम और कोकुण धागा उद्योग

Published: Sat, 17 Oct 2026 12:05 PM (IST)

देवघर में पांच साल बाद झारक्राफ्ट के माध्यम से रेशम उद्योग फिर से शुरू होने जा रहा है, जिससे 60 प्रशिक्षित कारीगरों को रोजगार मिलेगा।

झारक्राफ्ट की सिल्क यूनिट। फोटो जागरण

झारक्राफ्ट की सिल्क यूनिट। फोटो जागरण

HighLights

  1. देवघर में पांच साल बाद रेशम उद्योग पुनर्जीवित होगा।

  2. झारक्राफ्ट के तहत 60 प्रशिक्षित कारीगरों को रोजगार।

  3. दुर्गापूजा के बाद पायलट प्रोजेक्ट से उत्पादन शुरू।

आरसी सिन्हा, देवघर। घर-घर में आत्मनिर्भरता की कहानी गढ़ी जाए। स्व-रोजगार की तलाश में भटक रहे युवक-युवतियों का कौशल का विकास हो। ऐसे ही इरादे को लेकर उद्योग विभाग है। उसकी एक यूनिट झारक्राफ्ट है।

यहां हुनरमंद को रोजगार और हुनर की अभिलाषा रखने वाले को प्रशिक्षण देकर उनको उत्पाद से जोड़ने और उनके उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है।

देवघर जिले में बुनकरों, कारीगरों, कोकुण से धागा निकालने के कार्य में दक्ष बनाकर उनको रोजगार मुहैया कराने के लिए 2016 में झारक्राफ्ट की यूनिट शुरू हुई।

2016 से 2019 तक कोकुण से धागा निकालने के लिए 120 लोगों को दक्ष किया गया। उसके बाद उनको मुकम्मल काम नहीं मिला तो वह अपनी पहुंच के हिसाब से काम करने लगे। इसके बाद कोरोना आ गया और झारक्राफ्ट ने अपनी इन योजनाओं को कोने में रख दिया।

2020 से अब तक एक भी प्रशिक्षण और रोजगार कोकुण से धागा बनाने का नहीं दिया गया। विभाग हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहा। जबकि देवघर में भी कोकुण तैयार होता है। कमजोर इच्छा शक्ति और विभाग के ढीलेपन के कारण सबकुछ ठहर गया।

पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर पूजा के बाद शुरू होगा रेशमी धागा से उत्पाद

पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर देवघर में कोकुण से धागा और रेशमी धागा से उत्पाद तैयार करने का काम दुर्गापूजा के बाद जल्द शुरू होने वाला है। झारक्राफ्ट के माध्यम से होने वाले सारे कार्य की पूरी प्रक्रिया चल रही है। इसमें पहले से प्रशिक्षित 60 कारीगर को रोजगार मिलेगा।

मानदेय पर धागा तैयार करने वालों का भुगतान होगा। झारक्राफ्ट की यूनिट संप्रति शिल्पग्राम में चल रही है। आधारभूत संरचना देखेंगे तो हैरान हो जाएंगे। प्रशिक्षण देने से लेकर उत्पाद के प्रदर्शन के लिए सरकार की ओर से सारी सुविधाएं दी गयी है।

मार्केटिंग काम्प्लेक्स भी है। परंतु सबके सब बेकार पड़े हैं। राज्य सरकार की ओर से ठोस पहल नहीं किए जाने के कारण पांच साल से सारी गतिविधि ठप रही।

कोरोना काल से पहले झारक्राफ्ट की देवघर यूनिट ने 120 कुशल कारीगर को प्रशिक्षण देकर तैयार किया। पांच साल बाद उनमें 60 कारीगर को प्रोडक्शन में जोड़ने की तैयारी हो रही है।

रखे-रखे मशीन हो रहे बेकार

कोकुण से धागा तैयार करने के लिए दो सौ मशीन यहां लगाया गया है। जिसमें आज की तारीख में लगभग 55 को छोड़कर सबके सब मरम्मत खोज रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनका उपयोग ही बंद हो गया। यह बात दीगर है कि जब मशीन लगी थी तब युद्ध स्तर पर काम शुरू हुआ था।

दिन-रात हैंडलूम से वस्त्र तैयार होते थे और उनको बाजार भी मिलता था। सिल्क के शर्ट तैयार होते थे और उनको बाजार भी मुहैया कराया जाता था।

पूरे झारखंड में झरक्राफ्ट का उत्पाद धूम मचाने लगा था। जबरदस्त ब्रांडिंग होती रही है। आज कहीं कहीं आउटलेट मिल जाते हैं लेकिन लोकल फार वोकल की बात नहीं हो रही है।

देवघर में कोकुण है पर धागा को जोड़ने वाला नहीं

उद्योग विभाग के समुचित पहले से ही देवघर को रेशम के क्षेत्र में विकसित किया जा सकता है। मधुपुर के जीतपुर जंगल में कोकुण उत्पादन को लेकर करीब तीन लाख पौधे आसान और अर्जुन का लगा हुआ है। करीब 55 साल से कोकुण की खेती आदिवासी व घटवाल समुदाय के किसान कर रहे हैं।

2017 तक कोकुण की कीमत बेहतर मिलती थी। आज यहां इसका कारोबार नहीं होने से व्यापारी कम दाम में खरीद कर ले जाते हैं। गांव वाले बताते हैं कि जीतपुर से कोकुण खरीदकर व्यापारी द्वारा बेंगलुरु भेजा जाता है और बेंगलुरु का नाम रेशम उत्पादन के क्षेत्र में लिया जाता है, जबकि हकीकत यह है कि सारी व्यवस्था अगर देवघर में हो जाए तो कोकुण खरीदने, धागा तैयार करने और उस धागा से उत्पाद तैयार करने तक का काम हो सकता है। ऐसा होने से भारत के मानचित्र में झारखंड का नाम हो जाएगा।

पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर देवघर में कोकुण से धागा और रेशमी धागा से फ्रेब्रिक और साड़ी तैयार करने का काम जल्द शुरू होने वाला है। झारक्राफ्ट के माध्यम से होने वाले सारे कार्य की पूरी प्रक्रिया चल रही है। इसमें पहले से प्रशिक्षित 60 कारीगर को रोजगार मिलेगा। कोकुण और धागा विभाग से प्राप्त होगा। उसके बाद मानदेय पर धागा तैयार करने वालों का भुगतान होगा। -अब्दुल कादिर, सीनियर कलस्टर मैनेजर, देवघर।