जागरण संवाददाता, देवघर: स्वामी विवेकानंद कई बार देवघर आए। रवींद्र नाथ टैगोर ने कहा था कि भारत को समझने के लिए विवेकानंद को पढ़ना होगा। देवघर इसलिए भी खास है कि शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लेने से पहले और लौटकर विवेकानंद बैद्यनाथ की नगरी ही आए थे। जागरण ने उनकी जयंती पर 12 जनवरी से अभियान चलाया है कि विवेकानंद जिस डढ़वा नदी के घाट पर घंटों समय व्यतीत करते थे उसे धरोहर के रूप में विकसित किया जाए। इस बावत सूबे के पर्यटन, कला संस्कृति मंत्री हफीजुल हसन ने कहा कि पर्यटन विभाग एक प्रस्ताव बनाकर उस स्थल को धरोहर के रूप में विकसित करेगा। विवेकानंद सर्किट की संभावनाओं को तलाश कर उस पर काम किया जाएगा। रामेश्वर में बने मेमोरियल राक का अध्ययन करा सरकार इसपर पहल करेगी। जागरण के इस प्रयास की सराहना करते कहा कि स्वामीजी दुनिया को राह दिखाई है। उनके साहित्य से युवा पीढ़ी को किस तरह अवगत कराया जाए और खासकर देवघर के डढ़वा नदी तट को विकसित किया जाएगा। इस पर उपायुक्त से पूरा विवरण मांगकर, सरकारी स्तर पर काम किया जाएगा। उस स्थल तक पहुंचने के लिए रास्ते और उस घाट के सुंदरीकरण को भी प्रोजेक्ट में शामिल किया जाएगा। स्वामीजी से जुड़ी यादों को वहां सहेजा जाएगा। --------- देवघर को अपना दूसरा घर मानते थे विवेकानंद : सांसद

सांसद डा. निशिकांत दुबे ने कहा कि स्वामी विवेकानंद का देवघर से अलग ही लगाव था। वह देवघर को अपना दूसरा घर मानते थे। यही कारण था कि वह कई बार देवघर आए और कई दिनों तक यहां ठहरे। डढ़वा नदी के तट पर स्वामी विवेकानंद घंटों ध्यानमग्न रहते थे। उसे विकसित करने की जरूरत है। जागरण ने युवा पीढ़ी को इतिहास से अवगत कराने की अच्छी पहल की है। डढ़वा नदी तट पर सर्किट बनवाकर उसके जीर्णोद्धार की आवश्यकता है।

देवघर, जसीडीह और बिहार के सिमुलतला को मिलाकर विवेकानंद सर्किट बनाया जा सकता है। आज भी सिमुलतला में वह खंडहर मकान विवेकानंद की यादों को ताजा करता है। पूरे क्षेत्र में विवेकानंद का प्रवास हुआ है, इसलिए इसे सर्किट के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। सर्किट बनाकर ही इन क्षेत्रों के उन स्थल को संरक्षित किया जा सकता है। अभी अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। चूंकि नदी हमारी संस्कृति की तरह है। डढ़वा नदी के तट पर घंटों बैठकर स्वामी जी नदी के प्रवाह को देखते थे। जानकारी हो कि स्वामी विवेकानंद के कारण आज स्वाधीनता का यह अमृत महोत्सव मना रहे हैं। भारतवासियों के रग रग में स्वाधीनता का भाव जगाने का काम स्वामीजी ने किया था।

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