करौं (देवघर) : प्रखंड मुख्यालय से पांच किलोमीटर दूर सीमा पर बसा है करीब 800 की आबादी वाला आदिवासी बहुल लालापोखर गांव। हिचकोले खाने वाले रास्तों से होकर गांव पहुंचने पर कुछ बच्चे खेलते दिखे। वहीं एक पेड़ की छांव में सीताराम मोहली व उसकी पत्नी लुखी देवी बांस से टोकरी व पंखा बना रहे थे। थोड़ी दूर आगे जाने के बाद कुछ मजदूर शारीरिक दूरी का पालन करते हुए काम कर रहे थे। काम कर रहे मनरेगा मजदूर समर मोहली, सनातन मुर्मू, सिमोती देवी, हेलन हेम्ब्रम, सोनाराम मुर्मू, बाबूलाल हांसदा आदि ने बताया कि लॉकडाउन में छूट मिलने के पहले उनलोगों को रोजगार उपलब्ध नहीं हो रहा था। सरकार से मिलने वाले राशन से उनलोगों का घर चल रहा था। लेकिन लॉकडाउन में छूट मिलने के बाद यहां के 30 मजदूरों को मनरेगा के तहत संचालित प्रधानमंत्री आवास, ट्रेंच कटिग व डोभा निर्माण जैसी योजनाओं में काम मिला जिससे उनकी स्थिति में सुधार आया है।

बांस से कई परिवार के जीवन का आधार : दरअसल, लालापोखर गांव के लगभग 50 परिवारो की जिदगी बांस की टोकरी पर टिकी है। यहां के निवासी बांस पर अपनी अंगुलियों की जादू दिखाकर गुजर बसर करते थे। बांस खरीदकर लाते और उनसे टोकरी, खचिया, हाथ पंखा, सूप, डाली व शादी का सामान बनाकर बेचा करते थे। शादी ब्याह में इनके सामानों की खूब बिक्री होती थी। सीताराम मोहली, सुरेश मोहली, बाबूलाल मोहली, मनोहरलाल मोहली आदि ने बताया कि लॉकडाउन के कारण सामान तो बनाया है लेकिन उसकी बिक्री नहीं हो रही है। पहले कुछ व्यापारी गांव आकर इन सामान को खरीदते थे। अब वे सभी घर-घर घूम कर बांस से बने सामान को बेचा करते हैं। बताया कि एक मजदूर दो दिन मेहनत कर चार से पांच टोकरी बनाता है। इससे 100 रुपये की आमदनी हो जाती है लेकिन इन दिनों बिक्री कम होने से परिवार का गुजर बसर भी मुश्किल से हो रहा है।

Posted By: Jagran

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