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ऊधमपुर में आतंकियों की पनाहगाह बनाने की कोशिश विफल, सुरक्षा बल ठिकानों तक पहुंचे

By Amit Mahi Edited By: Hema Devi
Published: Fri, 18 Sep 2026 10:20 AM (IST)

ऊधमपुर के दुर्गम जंगलों को पनाहगाह बनाने की आतंकियों की कोशिश अब उन्हीं पर भारी पड़ रही है। लगातार अभियानों ...और पढ़ें

कठुआ-सांबा से चिनाब घाटी जाने वाले कॉरिडोर पर लगातार घेराबंदी।

कठुआ-सांबा से चिनाब घाटी जाने वाले कॉरिडोर पर लगातार घेराबंदी।

HighLights

  1. ऊधमपुर के दुर्गम जंगलों में आतंकियों की पनाहगाह बनाने की कोशिश विफल

  2. लगातार अभियानों और खुफिया नेटवर्क से सुरक्षा बल ठिकानों तक पहुंचे

  3. आतंकियों का लंबा ठहराव अब उनकी घेराबंदी का मुख्य कारण बना

अमित माही, ऊधमपुर। कठुआ-सांबा की ओर से घुसपैठ के बाद बसंतगढ़-डुडू और सियोज के दुर्गम जंगलों से चिनाब घाटी और आगे कश्मीर की तरफ बढ़ने के दशकों पुराने ट्रांजिट रूट को सुरक्षित पनाहगाह समझकर लंबे समय तक टिकने की आतंकियों की कोशिश अब उन्हीं पर भारी पड़ने लगी है।

2024 में इस कॉरिडोर में दोबारा सक्रियता बढ़ने के शुरुआती दौर में आतंकी घने जंगलों, गहरे गड्ढों और कठिन पहाड़ियों का फायदा उठाकर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने के बाद कई बार घेराबंदी से निकलने में सफल रहे।

मगर लगातार सर्च ऑपरेशन, एरिया डोमिनेशन तथा मजबूत होते तकनीकी और मानवीय खुफिया नेटवर्क ने तस्वीर बदल दी है। अब इन्हीं जंगलों में सुरक्षा बल आतंकियों के ठिकानों तक पहुंचकर उन्हें घेरने और मार गिराने में सफल हो रहे हैं।

आतंकवाद के काले दौर में भी बसंतगढ़ और आसपास के जंगल आतंकियों के मूवमेंट का क्षेत्र रहे हैं। 30 अप्रैल 2006 को ललौन गला में 13 लोगों का नरसंहार यहां की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा।

इसके बाद क्षेत्र अपेक्षाकृत शांत रहा, हालांकि 2015 में चांज पुलिस पोस्ट पर हमले में दो एसपीओ घायल हुए। करीब दो दशक बाद 2024 से आतंकियों और सुरक्षा बलों का आमना-सामना फिर बढ़ा। 28 अप्रैल 2024 को चोचरू गाला में मुठभेड़ के दौरान वीडीजी सदस्य मोहम्मद शरीफ बलिदान हुए।

घने जंगलों का फायदा उठा छिपते थे आतंकी

19 अगस्त को डुडू में आतंकियों की घात लगाकर की गई फायरिंग में सीआरपीएफ इंस्पेक्टर कुलदीप कुमार बलिदान हुए। 24 अप्रैल 2025 को बसंतगढ़-डुडू क्षेत्र में मुठभेड़ में सेना की 6 पैरा स्पेशल फोर्सेज के हवलदार झंटू अली शेख बलिदान हो गए।

19-20 सितंबर 2025 की रात सियोज धार के कांजी क्षेत्र में लांस दफादार बलदेव चंद और 15 दिसंबर 2025 को मजालता के सोहन क्षेत्र में आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान जम्मू-कश्मीर पुलिस के एसओजी जवान अमजद पठान बलिदान हुए।

कई अभियानों के दौरान कई बार सुरक्षा बल आतंकियों के बेहद करीब पहुंचे और उनको घेरा भी और मुठभेडें भी हुई, लेकिन घने जंगल, गहरी खड्ड, खराब दृश्यता और स्थानीय मददगारों से मिलने वाली रसद व रास्तों की जानकारी आतंकियों को घेरा तोड़ने में मदद करती रही।

यही वजह रही कि संदिग्ध मूवमेंट अथवा मुठभेड़ के बाद कई दिनों के संयुक्त तलाशी अभियान के बावजूद वे बच निकलते थे।

पुराना ट्रांजिट रूट बना आतंकियों की कब्रगाह

अब यही तस्वीर बदल रही है। लगातार ऑपरेशन और खुफिया नेटवर्क मजबूत कर सुरक्षा बलों ने आतंकियों की भौगोलिक बढ़त कम की है। मजालता के ब्रत्तल-खुबन जंगलों में ऑपरेशन सोहन के दौरान जैश-ए-मोहम्मद के दो पाकिस्तानी आतंकी सद्दाम और मुस्तफा मारे गए।

इससे पहले फरवरी 2026 में जोफड़ के जंगलों में ऑपरेशन केया के दौरान जैश के शीर्ष कमांडर रुबानी उर्फ अबू माविया और उसके एक साथी को सुरक्षा बलों ने ढेर किया था।

यानी जिन जंगलों में लंबे समय तक मौजूद रहकर आतंकी सुरक्षित ठिकाने बनाने की कोशिश कर रहे थे, वही ठहराव अब उनकी लोकेशन सामने आने का कारण बन रहा है।

कठुआ से चिनाब घाटी तक फैला ट्रांजिट रूट ध्वस्त

इस बदलाव का दूसरा अहम पहलू पुराने ट्रांजिट रूट का पनाहगाह के रूप में इस्तेमाल है। पहले कठुआ की तरफ से आने के बाद बसंतगढ़ के जंगल मुख्य रूप से डोडा-किश्तवाड़ और चिनाब घाटी की ओर आगे बढ़ने का रास्ता थे।

अब एक ही जंगल बेल्ट में लंबे समय तक मौजूदगी और गुज्जर-बक्करवाल परिवारों से भोजन लेने की घटनाएं अस्थायी ठिकाने बनाने की कोशिश की तरफ इशारा करती हैं।

यह कॉरिडोर कठुआ के ऊपरी बनी-मल्हार-मछेड़ी से बसंतगढ़-डुडू और सियोज धार होते हुए चिनाब घाटी तथा आगे कश्मीर की तरफ जाता है। सांबा-दयालाचक्क से मानसर-मजालता होते हुए बसंतगढ़ पहुंचने वाला रास्ता भी इसी व्यापक बेल्ट से जुड़ता है।

इसीलिए सुरक्षा एजेंसियों का जोर आतंकियों की रसद और स्थानीय सहयोगी नेटवर्क तोड़ने पर भी है। जंगल प्राकृतिक आड़ दे सकते हैं, लेकिन लंबे ठहराव के लिए भोजन, ठिकाने और रास्तों की जानकारी जरूरी है।

बसंतगढ़ क्षेत्र में आतंकियों को रसद और रास्ते उपलब्ध कराने वाले मददगार पहले भी सामने आए हैं और अब एक अन्य संदिग्ध मददगार के पकड़े जाने से महत्वपूर्ण जानकारियां मिलने की उम्मीद है।

पिछले दो वर्षों की घटनाएं बताती हैं कि पुराना ट्रांजिट रूट और संदिग्ध मूवमेंट की चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है, मगर इन्हीं जंगलों को सुरक्षित पनाहगाह मानकर लंबे समय तक टिकना अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।

शुरुआत में जिस दुर्गम भूगोल ने आतंकियों को हमला कर निकलने का मौका दिया, लगातार सुरक्षा दबाव के बीच वही लंबा ठहराव अब उनकी घेराबंदी का कारण बन रहा है। जिसे सुरक्षित पनाहगाह बनाने की कोशिश थी, वही अब आतंकियों का अंतिम ठिकाना साबित होने लगा है।

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