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मेला सजा था, जयकारे गूंज रहे थे... फिर मिनटों में उजड़ गया सबकुछ, 14 अगस्त की खौफनाक दोपहर याद कर आज भी डर जाते लोग

Published: Thu, 13 Aug 2026 07:15 AM (GMT+05:30)

चशोती त्रासदी के एक साल बाद जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, लेकिन 14 अगस्त 2025 की बादल फटने की ...और पढ़ें

चशोती त्रासदी में 66 लोगों की मौत हुई थी।

चशोती त्रासदी में 66 लोगों की मौत हुई थी।

HighLights

  1. चशोती त्रासदी के एक साल बाद जीवन सामान्य हो रहा है।

  2. बादल फटने से 66 मौतें और 30 लापता लोग मृत घोषित।

  3. प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास सहायता मिल रही है।

बलवीर सिंह जम्वाल, किश्तवाड़ः त्रासदी के एक वर्ष बाद चशोती में जिंदगी धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। आवाजाही बढ़ी है, जगह और रास्ते फिर आबाद होने लगे हैं। प्रभावित परिवार भी अपने जीवन को दोबारा पटरी पर लाने में जुटे हैं। त्रासदी में बह गए मकानों की जगह नए आशियाने तैयार हो रहे हैं और सरकार की ओर से पुनर्वास व मुआवजे की प्रक्रिया भी आगे बढ़ रही है। मगर एक साल बीतने के बाद भी 14 अगस्त 2025 की वह दोपहर लोगों के जेहन में वैसी ही ताजा है।

उस दिन बादल फटने के बाद आए मलबे और सैलाब ने जिस तरह पलक झपकते ही श्रद्धा और उत्सव के माहौल को मातम में बदल दिया था, उसका डर और अपनों को खोने का दर्द आज भी वैसा ही है।

14 अगस्त को क्या हुआ था 

14 अगस्त 2025 को माता चंडी मचैल की यात्रा पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ चल रही थी। चशोती तक वाहन पहुंच रहे थे, जबकि आगे हमोरी तक श्रद्धालु दोपहिया वाहनों से जा रहे थे। इसके बाद करीब तीन किलोमीटर का रास्ता पैदल तय किया जा रहा था। चशोती में श्रद्धालुओं की भीड़ थी और ऐसा लग रहा था जैसे बड़ा मेला लगा हो।

काली माता मंदिर परिसर में लंगर चल रहा था। नाले के किनारे दुकानें सजी थीं। कोई प्रसाद ग्रहण कर रहा था तो कोई चाय, मक्की की रोटी और साग खा रहा था। नाले के ऊपर बने कच्चे पुल पर श्रद्धालु खड़े होकर सेल्फी ले रहे थे और माता के जयकारे लगा रहे थे। दोपहर करीब 11:45 बजे अचानक तेज गड़गड़ाहट सुनाई दी। किसी को समझ नहीं आया कि आवाज कहां से आ रही है।

जयकारों की जगह चीख-पुकार ने ली

कुछ लोगों ने दूर से देखा तो नाले में बड़े-बड़े पत्थर पानी के साथ बहते नजर आए। देखते ही देखते पूरा नाला काले पानी और मलबे से भर गया। जो भी इसकी चपेट में आया, उसे संभलने तक का मौका नहीं मिला।

कुछ लोग किनारों पर जा लगे, कुछ मलबे और दलदल के साथ बह गए, जबकि कई लोग दब गए। कुछ ही मिनट में माता के जयकारों की जगह चीख-पुकार ने ले ली और लोग जान बचाने के लिए मचैल तथा गुलाबगढ़ की ओर भागने लगे।

जब लोगों को समझ आया कि यह तबाही बादल फटने से हुई है तो हर तरफ सन्नाटा पसर गया। स्थानीय लोगों, पुलिस और सुरक्षा बलों ने तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू किया। सूचना मिलते ही सेना, अर्धसैनिक बल और प्रशासनिक अधिकारी भी चशोती पहुंच गए। दर्जनों एंबुलेंस मौके पर पहुंचीं और घायलों को गुलाबगढ़ व अठोली अस्पताल ले जाया गया। बाद में गंभीर घायलों को अन्य अस्पतालों में भेजा गया।

66 लोगों की मौत

इस त्रासदी में 66 लोगों की मौत हुई, जबकि 31 लोग लापता हो गए। कई दिनों तक लापता लोगों की तलाश चलती रही, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। बाद में एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और अर्धसैनिक बलों की टीमें वापस लौट गईं। त्रासदी के बाद माता चंडी की यात्रा भी स्थगित कर दी गई और केवल पवित्र छड़ी को साधारण तरीके से दरबार तक ले जाकर पूजा-अर्चना की गई।

एक साल बाद लापता लोगों के परिजनों का लंबा इंतजार भी खत्म हुआ है। एसडीएम पाडर डॉ. अमित कुमार के अनुसार 31 लापता लोगों में से एक व्यक्ति की पहचान नहीं हो सकी है, जबकि 30 लोगों के मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिए गए हैं। उनके परिवारों को सरकार की ओर से निर्धारित मुआवजा दिया जाएगा।

66 मृतकों के परिवारों को मुआवजा पहले ही दिया जा चुका है। जमीन, मकान और दुकान गंवाने वाले प्रभावित परिवारों को भी सहायता दी जा रही है।

आज भी याद है लोगों को वो दिन

त्रासदी में बह गए मकानों के पुनर्निर्माण का काम भी शुरू हो चुका है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने चशोती पहुंचकर प्रभावित परिवारों के पुनर्वास का भरोसा दिया था। आज चशोती में जिंदगी आगे बढ़ रही है, लेकिन यहां के लोगों के लिए 14 अगस्त सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है।

यह वह दिन है, जिसकी गड़गड़ाहट आज भी कानों में गूंजती है और जिसने कुछ ही मिनटों में अपनों, घरों और खुशियों को छीन लिया था।