मां वैष्णो देवी यात्रा का दूसरा पड़ाव, यहां कन्या रूप में पूजी जाती हैं मां भगवती; जानिए देवामाई मंदिर की कथा
माता वैष्णो देवी यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव देवामाई मंदिर कटड़ा से 5 किमी दूर स्थित है। मान्यता है कि ...और पढ़ें

कटड़ा के निकट स्थित प्राचीन देवामाई मंदिर।
HighLights
देवामाई मंदिर माता वैष्णो देवी यात्रा का दूसरा पड़ाव।
माता ने यहां कन्या रूप में 110 वर्ष तपस्या की।
यह मंदिर कटड़ा से 5 किमी दूर स्थित, आस्था का केंद्र।
जागरण संवाददाता, कटड़ा। माता वैष्णो देवी की पवित्र यात्रा में कटड़ा के निकट स्थित प्राचीन देवामाई मंदिर का विशेष धार्मिक महत्व है। कटड़ा से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित यह मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। हरे-भरे घने जंगलों के बीच स्थित देवामाई मंदिर तक श्रद्धालु सड़क मार्ग से या पैदल आसानी से पहुंच सकते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता वैष्णो देवी की पारंपरिक यात्रा में देवामाई को दूसरे दर्शन के रूप में जाना जाता है। यहां प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु माथा टेककर परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं। देवामाई मंदिर का संबंध माता वैष्णो देवी की प्राचीन धार्मिक परंपराओं और लोककथाओं से जुड़ा है।
मान्यता है कि माता ने इस स्थान पर कन्या रूप में रहकर 110 वर्ष तक तपस्या की थी। इसी कारण यह स्थल भक्तों के लिए विशेष श्रद्धा और आध्यात्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है।
कौल कंडोली के बाद देवामाई के दर्शन की परंपरा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता वैष्णो देवी की पारंपरिक यात्रा का पहला दर्शन जम्मू के नगरोटा क्षेत्र में स्थित कौल कंडोली मंदिर में माना जाता है। इसके बाद श्रद्धालु देवामाई मंदिर में दर्शन करते थे। यहां माथा टेकने के बाद कटड़ा पहुंचकर बाणगंगा, चरण पादुका, अर्धकुंवारी और माता के पवित्र भवन में दर्शन करने की परंपरा रही है।
इसके पश्चात भैरव बाबा के दर्शन किए जाते हैं। हालांकि, वर्तमान में अधिकांश श्रद्धालु सीधे कटड़ा पहुंचकर भवन की यात्रा शुरू करते हैं, लेकिन पारंपरिक यात्रा में आस्था रखने वाले भक्त देवामाई मंदिर में भी शीश नवाते हैं।
मंदिर का इतिहास और प्रचलित कथा
मंदिर से जुड़ी प्रचलित कथा के अनुसार, पंडित श्यामी दास माता वैष्णो देवी के परम भक्त थे। स्थानीय धार्मिक परंपरा में उन्हें माता के भक्त पंडित श्रीधर की चौथी पीढ़ी का वंशज बताया जाता है। कहा जाता है कि वह प्रतिदिन माता के पवित्र भवन में दर्शन करने जाते थे और दर्शन किए बिना अन्न ग्रहण नहीं करते थे।
लोककथा के अनुसार, उनके घर कन्या का जन्म होने पर सूतक के कारण मंदिर जाने में बाधा उत्पन्न हो गई। इस दौरान उन्होंने माता के दर्शन होने तक अन्न ग्रहण नहीं करने का संकल्प लिया। मान्यता है कि उसी रात माता ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर बताया कि उनके घर जन्मी कन्या स्वयं उनका ही स्वरूप है।
इससे भावविभोर होकर पंडित श्यामी दास ने कन्या का नाम ‘माई देवा’ रखा। इसी नाम से इस पवित्र स्थल की पहचान देवामाई के रूप में जुड़ी मानी जाती है।
मंदिर में मां शीला के रूप में विराजमान
देवामाई मंदिर के पुजारी बंसी लाल शर्मा ने बताया कि माता वैष्णो देवी ने देवामाई में कन्या रूप में लगभग 110 वर्षों तक निवास कर तपस्या की थी। उनके अनुसार, माता यहां मां शीला के रूप में विद्यमान हैं। तपस्या पूर्ण होने के बाद माता ने दिव्य स्वरूप धारण किया।
मंदिर में आज भी इसी आस्था के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। देवामाई मंदिर मां वैष्णो देवी की आध्यात्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है। मान्यता है कि माता के दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
भक्तों की आस्था का केंद्र
देवामाई मंदिर के सेवादार एवं भक्त संजीव शर्मा ने बताया कि मां शीला के रूप में विराजमान माता श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। उनके अनुसार, यहां दर्शन करने से असीम खुशी और शांति मिलती है। भक्तों की मान्यता है कि मां के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता।
माता वैष्णो देवी की यात्रा करने वाले अधिकांश श्रद्धालु देवामाई मंदिर पहुंचकर परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं। यह मंदिर माता वैष्णो देवी की प्राचीन धार्मिक विरासत और लोक आस्था का प्रतीक है।
