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कश्मीर की वुलर झील की गहराई में क्या छिपा? मिट्टी ने खोले सदियों पुराने राज; AI ने बताए 3 बड़े स्रोत

Published: Fri, 18 Sep 2026 07:15 AM (IST)

वुलर झील की तलछट कश्मीर के भूगर्भीय इतिहास के महत्वपूर्ण राज खोल रही है, जिसमें उच्च हिमालयी चट्टानें, पांजाल ट्रैप ...और पढ़ें

वुलर झील में जमा होने वाली मिट्टी और गाद तीन प्रमुख स्रोतों से आती है। (फाइल फोटो)

वुलर झील में जमा होने वाली मिट्टी और गाद तीन प्रमुख स्रोतों से आती है। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. वुलर की तलछट में कश्मीर का भूगर्भीय इतिहास छिपा है।

  2. तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक स्रोत: हिमालयी चट्टानें, पांजाल ट्रैप, करेवा समूह।

  3. भू-रासायनिक विश्लेषण और मशीन लर्निंग से अध्ययन किया गया।

नवीन नवाज, श्रीनगर। कश्मीर की प्रसिद्ध वुलर झील केवल पानी का बड़ा भंडार नहीं है, बल्कि इसकी तलछट क्षेत्र के भूगर्भीय इतिहास की महत्वपूर्ण जानकारी भी अपने भीतर समेटे हुए है जो अब अब हिमालय के भूगर्भीय इतिहास को पढ़ने का नया जरिया बन रही है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में पता चला है कि झील में जमा होने वाली मिट्टी और गाद मुख्य रूप से तीन प्रमुख भूवैज्ञानिक स्रोतों से आती है।

इनमें उच्च हिमालयी क्रिस्टलीय चट्टानें, पांजाल ट्रैप की ज्वालामुखीय चट्टानें और करेवा समूह शामिल हैं। शोधकर्ताओं ने तलछट के भू-रासायनिक विश्लेषण के साथ आधुनिक मशीन लर्निंग तकनीकों का इस्तेमाल किया। दोनों तरीकों से लगभग एक जैसे परिणाम सामने आए। यह अध्ययन 3 अगस्त 2026 को मिनरल्ज जर्नल में प्रकाशित हुआ है।

वुलर झील की गहराई से निकली मिट्टी ने खोले राज

शोधकर्ताओं ने नाव से झेलम के वुलर में प्रवेश और निकास क्षेत्र, झील के मध्य भाग तथा उत्तरी, पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों से करीब दो से पांच मीटर गहरे पानी में तलछट की ऊपरी पांच से 10 सेंटीमीटर परत से नमूने लिए। इनमें 10 प्रमुख आक्साइड, 25 ट्रेस तत्व और 14 दुर्लभ मृदा तत्वों समेत 49 भू-रासायनिक संकेतकों का विश्लेषण किया गया। एक्स-रे विवर्तन से खनिज संरचना जांचने पर क्वार्ट्ज, मस्कोवाइट/इलाइट, क्लोराइट और फेल्डस्पार प्रमुख मिले।

नमूनों का केमिकल इंडेक्स ऑफ अल्टरेशन (सीआइए) 68.5 से 75.1, औसतन 72.1 रहा, जो मध्यम रासायनिक अपक्षय का संकेत है। साथ ही आइसीवी एक से अधिक और जिरकान से संबंधित अनुपात कम मिलने से तलछट को अपेक्षाकृत अपरिपक्व और पहली बार चट्टानों के टूटने से बनी सामग्री माना गया है।

मशीन लर्निंग ने इस तस्वीर को और मजबूत किया

मशीन लर्निंग ने इस तस्वीर को और मजबूत किया। प्रिंसिपल कंपोनेंट एनालिसिस, रैंडम फारेस्ट और एसएचएपी विश्लेषण की तीन-स्तरीय प्रक्रिया में रैंडम फारेस्ट ने 22 नमूनों पर लीव-वन-आउट क्रास-वैलिडेशन में 95.5 प्रतिशत की माध्य सटीकता हासिल की। वहीं बिना पहले से दिए गए स्रोत-लेबल के किए गए के-मीन्स क्लस्टरिंग ने भी वही तीन भू-रासायनिक समूह बनाए और उसका एडजस्टिड रैंड इंडेक्ट 1.0 रहा।

हालांकि शोधपत्र स्पष्ट करता है कि चूंकि माडल के लेबल उसी भू-रासायनिकों के आंकड़ों से तैयार हुए हैं, इसलिए यह परिणाम स्वतंत्र प्रमाण नहीं, बल्कि प्रस्तावित स्रोत-माडल की आंतरिक संगति का परीक्षण है

वुलर की तलछट ने बताए अपने स्रोतों के संकेत

एसएचएपी विश्लेषण ने यह भी बताया कि माडल किन तत्वों के आधार पर स्रोतों को अलग करता है। माफिक समूह में निकेल, आयरन ऑक्साइड, स्कैंडियम, क्रोमियम और वैनेडियम प्रमुख संकेतक रहे, जबकि कार्बोनेट-युक्त समूह में कैल्शियम ऑक्साइड और स्ट्रान्शियम का योगदान बढ़ा। कैल्शियम आक्साइड की मात्रा लगभग 4-5 प्रतिशत से ऊपर जाने पर कार्बोनेट-युक्त स्रोत की पहचान की संभावना तेजी से बढ़ी।

अभी सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन तीनों स्रोतों का वुलर की कुल तलछट में वास्तविक योगदान कितना है। इसका जवाब पाने के लिए झील के आसपास की चट्टानों और सहायक नदियों से व्यापक नमूने लेकर एंड-मेंबर मिक्सिंग विश्लेषण करना होगा।

आगे गहरे तलछट कोर की जांच से हजारों वर्षों में कश्मीर की जलवायु, नदी प्रवाह, भू-क्षरण और भूमि उपयोग में आए बदलावों का भी पता लगाया जा सकता है। इस तरह वुलर की गाद भविष्य में कश्मीर के भूगर्भीय और पर्यावरणीय अतीत का प्राकृतिक अभिलेख साबित हो सकती है

यह अध्ययन बताता है कि भू-विज्ञान और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीकों को साथ इस्तेमाल कर झीलों के पर्यावरणीय और भूगर्भीय इतिहास को अधिक सटीक तरीके से समझा जा सकता